Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 420

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विमद ऐन्द्रः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ग्निं न स्ववृ꣢꣯क्तिभि꣣र्हो꣡ता꣢रं त्वा वृणीमहे । शी꣣रं꣡ पा꣢व꣣क꣡शो꣢चिषं꣣ वि꣢ वो꣣ म꣡दे꣢ य꣣ज्ञे꣡षु꣢ स्ती꣣र्ण꣡ब꣢र्हिषं꣣ वि꣡व꣢क्षसे ॥४२०॥

आ꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् । न । स्व꣡वृ꣢꣯क्तिभिः । स्व । वृ꣣क्तिभिः । हो꣡ता꣢꣯रम् । त्वा꣣ । वृणीमहे । शीर꣢म् । पा꣣वक꣡शो꣢चिषम् । पा꣣वक꣡ । शो꣣चिषम् । वि꣢ । वः꣣ । म꣡दे꣢꣯ । य꣣ज्ञे꣡षु꣢ । स्ती꣣र्ण꣡ब꣢र्हिषम् । स्ती꣣र्ण꣢ । ब꣣र्हिषम् । वि꣡व꣢꣯क्षसे ॥४२०॥

Mantra without Swara
आग्निं न स्ववृक्तिभिर्होतारं त्वा वृणीमहे । शीरं पावकशोचिषं वि वो मदे यज्ञेषु स्तीर्णबर्हिषं विवक्षसे ॥

आ । अग्निम् । न । स्ववृक्तिभिः । स्व । वृक्तिभिः । होतारम् । त्वा । वृणीमहे । शीरम् । पावकशोचिषम् । पावक । शोचिषम् । वि । वः । मदे । यज्ञेषु । स्तीर्णबर्हिषम् । स्तीर्ण । बर्हिषम् । विवक्षसे ॥४२०॥

Samveda - Mantra Number : 420
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(न)=जैसे (स्ववृक्तिभिः)=अपने कुछ वर्जन व त्याग से अग्निम् अग्नि को वरते हैं, अर्थात घृतसामग्री आदि में कुछ व्यय करके जैसे हम अग्निहोत्रादि उत्तम कर्मों को करते हैं, उसी प्रकार हम (होतारम्) = सर्वस्व दान करनेवाले (त्वा) = आपको (स्ववृक्तिभिः) = अपने कामादि दोषों के वर्जन से तथा यज्ञादि उत्तम कर्मों के आप में समर्पण से (आवृणीमहे) = आपका वरण करते हैं। प्रभु होता हैं—अपने को भी जीवहित के लिए दे डालनेवाले हैं। हम प्रभु का वरण दान द्वारा ही कर सकते हैं। अपने सब कर्मों का प्रभु में समर्पण ही वह महान् त्याग है जिससे हम प्रभु का वरण करते हैं। 'तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च'=यही वेद का उपदेश है कि कर्म करो और प्रभुचरणों में उसका त्याग कर दो। अपना अहं भाव न रक्खो-यही ‘स्ववृक्ति'=‘अपने को छोड़ना' है। वे प्रभु (शीरम्) = [शायिनं, आशिनं वा] सबमें निवास करनेवाले व सबमें व्याप्त हैं। मैं भी उस हृदयस्थ प्रभु को अनुभव करने का प्रयत्न करूँ। वे प्रभु तो (पावकशोचिषम्) = पवित्र करनेवाली ज्ञानदीप्तिवाले हैं। उस ज्ञानाग्नि में मेरा जीवन और पवित्र हो उठेगा।

वे प्रभु (यज्ञेषु स्तीर्णबर्हिष) ='यज्ञों में बिखेर दी है- व्याप्त कर दी है हमारी वृद्धि [बृहि वृद्धौ] जिन्होंने, ऐसे हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में यज्ञों को उत्पन्न करके प्रभु ने यही तो कहा कि ‘इससे फूलों-फलो, यह तुम्हारी सब इष्ट कामनाओं को पूरा करे'। ये यज्ञ (वः) = तुम्हारे (विमदे) = विशेष उल्लास के निमित्त हैं और (विवक्षसे) = विशेष उन्नति के साधन हैं [वक्षस्=growth]। यहाँ ‘विमदे व विवक्षसे' इन दोनों शब्दों में निमित्त सप्तमी है। यज्ञों के द्वारा हमारा जीवन उल्लासमय व विकासमय बनता है। प्रातः का अग्निहोत्र सायं तक और सायं का प्रातः तक चित्त को प्रसन्न रखता है। यज्ञों के बिना किसी भी विकास का सम्भव ही नहीं।
Essence
हमारा जीवन यज्ञमय हो, हम उस महान् होता के उपासक बनकर एक छोटे होता ही बनें । पर हमें उस होतृत्व का मद= गर्व न हो। उस यज्ञ को भी प्रभु - चरणों में अर्पित कर हम 'वि-मद' [मदशून्य] ही बने रहें ।
Subject
उल्लास व विकास