Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 413

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्रे꣢ह्य꣣भी꣡हि꣢ धृष्णु꣣हि꣢꣫ न ते꣣ व꣢ज्रो꣣ नि꣡ य꣢ꣳसते । इ꣡न्द्र꣢ नृ꣣म्ण꣢꣫ꣳहि ते꣣ श꣢वो꣣ ह꣡नो꣢ वृ꣣त्रं꣡ जया꣢꣯ अ꣣पो꣢ऽर्च꣣न्न꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥४१३॥

प्र꣢ । इ꣣हि । अभि꣢ । इ꣣हि । धृष्णुहि꣢ । न । ते꣣ । व꣡ज्रः꣢꣯ । नि । यँ꣣सते । इ꣡न्द्र꣢꣯ । नृ꣣म्ण꣢म् । हि । ते꣣ । श꣡वः꣢꣯ । ह꣡नः꣢꣯ । वृ꣣त्र꣢म् । ज꣡याः꣢꣯ । अ꣣पः꣢ । अ꣡र्च꣢꣯न् । अ꣡नु꣢꣯ । स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् । स्व꣣ । रा꣡ज्य꣢꣯म् ॥४१३॥

Mantra without Swara
प्रेह्यभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यꣳसते । इन्द्र नृम्णꣳहि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥

प्र । इहि । अभि । इहि । धृष्णुहि । न । ते । वज्रः । नि । यँसते । इन्द्र । नृम्णम् । हि । ते । शवः । हनः । वृत्रम् । जयाः । अपः । अर्चन् । अनु । स्वराज्यम् । स्व । राज्यम् ॥४१३॥

Samveda - Mantra Number : 413
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु जीव से कहते हैं कि (प्रेहि) = प्रकर्षण गतिवाला हो । तेरे एक-एक कदम में उत्साह टपके। एक सत्त्ववान् योधा की चाल में जो उत्साह है वह तेरी भी चाल में हो। (अभीहि) = तू अपने शत्रुओं पर आक्रमण करने के लिए बढ़ चल - उनकी ओर न कि उनसे दूर। तेरी चाल में किसी प्रकार का भय व आशंका न हो। इस प्रकार आक्रमण करके तू (धृष्णुहि) = अपने इन काम-क्रोधादि शत्रुओं का धर्षण कर। इन्हें तू कुचल डाल। इस आक्रमण में ते तेरी (वज्रः) = गति (न) = नहीं (नियंसते) = रोकी जाती। गत मन्त्र के उपायपञ्चक से अपराजेयशक्ति प्राप्त करके जब तू इन शत्रुओं पर आक्रमण करता है तो तेरा आक्रमण शत्रुओं से विहत नहीं होता। प्रभु कहते हैं कि हे (इन्द्र) = इन्द्रियों की शक्ति से सम्पन्न जीव! ते तेरा (शवः) = बल (हि) = निश्चय से (नृम्णम्) = [नृ नमन] शत्रुओं को झुका देनेवाला होता है। इस प्रकार तू (वृत्रं हनः) = ज्ञान के नित्य वैरी इस काम को नष्ट कर देता है और (अपः जय) = यज्ञरूप व्यापक कर्मों का विजेता बनता है। यह तू कर इसलिए पाएगा कि तू (ननु) = निश्चय से (स्वराज्यम्) = आत्मसंयम का (अर्चन) = आदर करता है।

संयमी पुरुष वासनाओं का जीतकर प्रभु के सच्चे उपासक बनते हैं।
Essence
हम वृत्र का विनाश करके स्वार्थ- शून्य उत्कृष्ट कर्मों को करनेवाले बनें।
Subject
प्रबल आक्रमण