Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 412

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣ तु꣢भ्य꣣मि꣡दद्रि꣣वो꣡ऽनु꣢त्तं वज्रिन्वी꣣꣬र्य꣢꣯म् । य꣢꣯द्ध꣣ त्यं꣢ मा꣣यि꣡नं꣢ मृ꣣गं꣢꣫ तव꣣ त्य꣢न्मा꣣य꣡याव꣢꣯धी꣣र꣢र्च꣣न्न꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥४१२॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । तु꣢भ्य꣢꣯म् । इत् । अ꣣द्रिवः । अ । द्रिवः । अ꣡नु꣢꣯त्तम् । अ । नु꣣त्तम् । वज्रिन् । वीर्य꣢꣯म् । यत् । ह꣣ । त्य꣢म् । मा꣣यि꣡न꣢म् । मृ꣣ग꣢म् । त꣡व꣢꣯ । त्यत् । मा꣣य꣡या꣢ । अ꣡व꣢꣯धीः । अ꣡र्च꣢꣯न् । अ꣡नु꣢꣯ । स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् । स्व꣣ । रा꣡ज्य꣢꣯म् ॥४१२॥

Mantra without Swara
इन्द्र तुभ्यमिदद्रिवोऽनुत्तं वज्रिन्वीर्यम् । यद्ध त्यं मायिनं मृगं तव त्यन्माययावधीरर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥

इन्द्र । तुभ्यम् । इत् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । अनुत्तम् । अ । नुत्तम् । वज्रिन् । वीर्यम् । यत् । ह । त्यम् । मायिनम् । मृगम् । तव । त्यत् । मायया । अवधीः । अर्चन् । अनु । स्वराज्यम् । स्व । राज्यम् ॥४१२॥

Samveda - Mantra Number : 412
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु जीव से कहते हैं कि हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! हे (अद्रिवः) = [अ+दृ] अपने निश्चय से पृथक न किये जाने योग्य, अर्थात् दृढ़ संकल्प व पक्के व्रतों वाले जीव ! हे (वज्रिन्) = गतिशील जीव! (तुभ्यम् इत्) = तेरे लिए ही (वीर्यम्) = वह शक्ति है जोकि (अनुत्तम्) = कभी भी परे नहीं धकेली जा सकती। जिस समय जीव इन्द्रियों को वश में कर लेता है, दृढ़ संकल्पवाला होता है, और सतत क्रियाशील बन जाता है तब उसे वह शक्ति प्राप्त होती है जो किसी भी प्रकार न्याय्य मार्ग से विचलित नहीं की जा सकती। इस अपराजेय शक्ति को प्राप्त करने का रहस्य यह भी है कि (यत्) = जो (ह) = निश्चय से त्(यम्) = उस (मयिनं मृगम्) = मायावी मृगतृष्णा के दृश्य के समान कभी भी तृष्णा शान्त न होने देनेवाले 'काम' को (तव) = तूने अपने (त्यत्मायया) = उस ज्ञान से (अवधी:) = मार डाला। यहाँ 'काम' को 'मायी मृग' कहा है। यह हमें कहाँ का कहाँ ले-जाता है, परन्जु कभी हमारी तृप्ति का कारण नहीं बनता। मृगतृष्णा के दृश्य के समान यह मायामय है। ‘मां याति' 'मुझे प्राप्त हो रहा है'-ऐसी प्रतीति होती है, परन्तु प्राप्त थोड़े ही होता है। इस काम का ध्वंस भी माया - ज्ञान से ही होता है। काम ज्ञान का शत्रु है। ज्ञान की मन्द ज्योति को काम बुझा देता है और ज्ञान की प्रचण्ड ज्वाला में वह स्वयं भस्म हो जाता है।

इस शक्ति की प्राप्ति का पाँचवाँ साधन ‘अर्चन्ननु - स्वराज्यम्' इन शब्दों से सूचित हो रहा है कि (ननु) = निश्चय से तूने (स्वराज्यम्) = आत्मसंयम का अर्चन्- आदर किया है। आत्मसंयम को महत्त्व देने का ही परिणाम है कि तू अदम्य शक्ति को संचित कर सका है। इस अदम्य शक्ति के कारण इसका जीवन सदा उल्लासमय है। 
Essence
मैं जितेन्द्रियता, दृढ़ संकल्प, क्रियाशीलता, प्रचण्डज्ञान की ज्योति तथा संयम के आदर के द्वारा उस शक्ति को प्राप्त करूँ जो कभी पराजित नहीं हो सके।
Subject
उपाय- पञ्चक