Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 405

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्वं꣡ न꣢ इ꣣न्द्रा꣡ भ꣢र꣣ ओ꣡जो꣢ नृ꣣म्ण꣡ꣳ श꣢तक्रतो विचर्षणे । आ꣢ वी꣣रं꣡ पृ꣢तना꣣स꣡ह꣢म् ॥४०५॥

त्व꣢म् । नः꣣ । इन्द्र । आ꣢ । भ꣣र । ओ꣡जः꣢꣯ । नृ꣣म्ण꣢म् । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । विचर्षणे । वि । चर्षणे । आ꣢ । वी꣣र꣢म् । पृ꣣तनास꣡ह꣢म् । पृ꣣तना । स꣡ह꣢꣯म् ॥४०५॥

Mantra without Swara
त्वं न इन्द्रा भर ओजो नृम्णꣳ शतक्रतो विचर्षणे । आ वीरं पृतनासहम् ॥

त्वम् । नः । इन्द्र । आ । भर । ओजः । नृम्णम् । शतक्रतो । शत । क्रतो । विचर्षणे । वि । चर्षणे । आ । वीरम् । पृतनासहम् । पृतना । सहम् ॥४०५॥

Samveda - Mantra Number : 405
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिसम्पन्न प्रभो! (त्वम्) = आप (नः) = हममें (ओजः) = शक्ति को (आभर) = सर्वथा भर दीजिए। ‘ओज' वह शक्ति है जो [ ओज जव पदबतमेंम] सब प्रकार की वृद्धि का कारण हुआ करती है। यह वीर्य की भी सारभूत वस्तु है। इससे अपने को भर सकने का उपाय एक ही है कि हम भी 'इन्द्र' - इन्द्रियों के अधिष्ठाता बनें । इन्द्र की अराधना करनेवाले को इन्द्र बनना ही चाहिए । इन्द्रियों के अधिष्ठाता बनकर हम शक्ति सम्पन्न बनेंगे और उस दिन उस सर्वशक्तिमान् 'इन्द्र' के सच्चे उपासक होंगे।

हे (शक्रततो) = अनन्त प्रज्ञान व यज्ञरूप कर्मोंवाले प्रभो! (नः) = हमें (नृम्णम्) = सुख (आभर) = प्राप्त कराईये । वस्तुतः सुख को प्राप्त करने के लिए हमें भी 'शतक्रतु' बनना है। हमारे सौ के सौ वर्ष क्रतुमय-यज्ञमय बीतें। यज्ञमय जीवन होनेपर हमारा घर स्वर्ग तुल्य बन जाएगा। इससे हम फुले-फलेंगे। और यह यज्ञ हमारी सब इच्छाओं को पूर्ण करनेवाला होगा।

हे (विचर्षणे) = विशेषरूप से देखनेवाले प्रभो! हमें (आवीरम्) = सब प्रकार से वह वीरता प्राप्त कराईये जोकि (पृतनासहम्) = हमें सब मनुष्यों को सह सकने योग्य बनाये, अर्थात् हममें वह शक्ति हो जोकि हमें इतना उदार बना दे कि हम अज्ञ लोगों से समय-समय पर किये जानेवाले मानापमानों को सह सकें। उनकी स्तुति - निन्दा हमें विचलित करनेवाली न हो। यह गुण-यह सहनशीलता हममें आएगी तभी जब हम 'विचर्षणि' बनेंगे- प्रत्येक वस्तु को सूक्ष्मता से देखनेवाले बनेंगे। विचारशील सदा सहिष्णु होता है।

यह ओजस्वी व सहनशील व्यक्ति सुखी जीवनवाला तो होता ही है - यह औरों के साथ मिलकर चलने से ‘नृमेध' कहलाता है और शक्तिसम्पन्न होने से ‘आंङ्गिरस' है। 
Essence
मैं जितेन्द्रिय बनकर 'ओजस्वी' बनूँ। यज्ञमय जीवनवाला बनकर सुख को सिद्ध करूँ और तत्त्वज्ञानी बनकर मानापमान व स्तुति - निन्दा में सम रहूँ।
Subject
ओज-नृम्ण-सहस्