Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 403

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡या꣢ ह स्विद्यु꣣जा꣢ व꣣यं꣡ प्रति꣢꣯ श्व꣣स꣡न्तं꣢ वृषभ ब्रुवीमहि । स꣣ꣳस्थे꣡ जन꣢꣯स्य꣣ गो꣡म꣢तः ॥४०३॥

त्व꣡या꣢꣯ । ह꣣ । स्वित् । युजा꣢ । व꣣य꣢म् । प्र꣡ति꣢꣯ । श्व꣣स꣡न्त꣢म् । वृ꣣षभ । ब्रुवीमहि । सँस्थे꣢ । स꣣म् । स्थे꣢ । ज꣡न꣢꣯स्य । गो꣡म꣢꣯तः ॥४०३॥

Mantra without Swara
त्वया ह स्विद्युजा वयं प्रति श्वसन्तं वृषभ ब्रुवीमहि । सꣳस्थे जनस्य गोमतः ॥

त्वया । ह । स्वित् । युजा । वयम् । प्रति । श्वसन्तम् । वृषभ । ब्रुवीमहि । सँस्थे । सम् । स्थे । जनस्य । गोमतः ॥४०३॥

Samveda - Mantra Number : 403
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु ने सोमपान के लिए आमन्त्रण दिया। सोभरि उस आमन्त्रण को सुनकर अनुभव करता है कि इस आमन्त्रण के स्वीकार में सबसे बड़ा विघातक 'काम' है। उसे पराजित करना भी तो उसके लिए सुगम नहीं है, अतः वह प्रभु से प्रार्थना करता है कि (ह स्विद्) = निश्चयपूर्वक (त्वया) = आप-से (युजा) = साथी से मिलकर (वयम्) = हम (वृषभ) = शक्तिशालिन् व सुखों की वर्षा करनेवाले प्रभो! (श्वसन्तम्) = इस फँकार मारते हुए, बल के दर्पवाले इस कामरूप शत्रु को (प्रतिब्रुबीहिं) = युद्ध के लिए ललकार दें। उसके आह्वान का ठीक प्रत्युत्तर दे दें। हे प्रभो! आपकी सहायता के बिना मेरे लिए इसे जीत सकना सम्भव नहीं। इसे जीते बिना मेरे लिए सोमपान के आमन्त्रण का स्वीकार भी तो असम्भव है।

हाँ, आपकी निराकारता मुझ निराकारता मुझ घबराये हुए के लिए एक बड़ी समस्या उपस्थित कर देती है। मैं आप के पीछे आऊँ भी तो कैसे? देखूँ, तभी तो। न आपको देख पाता हूँ, और न आपका अनुगामी बन पाता हूँ। ऐसी स्थिति में इसका एक ही हल है और वह यह कि मैं उन व्यक्तियों का अनुगामी बनूँ जो कि आपका साक्षात्कार करके आपके पीछे आ रहे हैं। (गोमतः) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाले (जनस्य) = लोगों के (संस्थे) = साथ मिलकर ठहरने में ही मेरा कल्याण है। ये लोग आप तक पहुँचेंगे तो इनके पीछे चलता हुआ मैं भी आप तक क्यों न पहुँचूँगा? आपकी छत्रछाया रहते हुए ये कामादि वासनाओं से आक्रान्त नहीं होते तो इनकी छत्रछाया मुझे भी इस आक्रमण से बचाएगी ही। वे निराकार के उपासक हैं तो मैं निराकार के इन साकार उपासकों का साकार उपासक हूँ। आपके सङ्ग से ये तरेंगे, और इनके सङ्ग मैं भी। हे प्रभो! आपकी कृपा से इन प्रशस्तेन्द्रिय, विकासशील सन्तों का सम्पर्क पाकर, कामादि को जीतकर मैं आपके सोमपान के आमन्त्रण को स्वीकार करनेवाला बनूँ। तभी तो मैंने इस अपने जीवन के कर्तव्य का सुभरण किया होगा। 
Essence
मैं सदा प्रशस्तेन्द्रिय सन्तों के सम्पर्क में रहनेवाला बनूँ।
Subject
जितेन्द्रियों के सम्पर्क में