Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 4

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢र्वृ꣣त्रा꣡णि꣢ जङ्घनद्द्रविण꣣स्यु꣡र्वि꣢प꣣न्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢द्धः शु꣣क्र꣡ आहु꣢꣯तः ॥४॥

अ꣣ग्निः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । ज꣣ङ्घनत् । द्रविणस्युः꣢ । वि꣣पन्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢꣯द्धः । सम् । इ꣣द्धः । शुक्रः꣢ । आ꣡हु꣢꣯तः । आ । हु꣣तः ॥४॥

Mantra without Swara
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥

अग्निः । वृत्राणि । जङ्घनत् । द्रविणस्युः । विपन्यया । समिद्धः । सम् । इद्धः । शुक्रः । आहुतः । आ । हुतः ॥४॥

Samveda - Mantra Number : 4
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मनुष्य की यह विवशता है कि वह चाहता हुआ भी काम-क्रोधादि वासनाओं को विनष्ट नहीं कर पाता। ये वासनाएँ अत्यन्त प्रबल हैं। ये मनुष्य की समझ पर परदा डाले रहती हैं और उसे अपना शिकार बना लेती हैं। इसलिए इस वासना को ‘वृत्र' कहते हैं। इस वृत्र को वह (अग्निः) = प्रभु ही (जंघनत्)=नष्ट करता है। परमेश्वर का स्मरण ही एकमात्र उपाय है जिससे वासनाओं का संहार होता है, परन्तु वह अग्नि (द्रविणस्युः)= द्रविण को चाहता है। यदि मनुष्य अपने पास धन का संचय किये रक्खे और यह चाहे कि प्रभु उसकी वासनाओं को विनष्ट कर दें तो यह नहीं हो सकता। वस्तुतः (विपन्यया) = विशिष्ट स्तुति के द्वारा ही हम यह कार्य प्रभु से करा पाते हैं। उस प्रभु की विशिष्ट स्तुति यही है कि हम उसी से प्रीति करें, हमें धन से प्रीति न हो। प्रभु की यही 'ऐकान्तिकी भक्ति' है। प्रभु और धन दोनों की उपासना युगपत् सम्भव नहीं है, अतः हम धन उस प्रभु को अर्पित कर दें और तब हमारी इस विशिष्ट स्तुति से वे प्रभु हमारे लिए वृत्रों का संहार करेंगे ।
प्रभु की प्राप्ति का क्रम यह होता है कि हम उसे अपने हृदयों में (समिद्धः) = दीप्त करते हैं। प्रकृति के सौन्दर्य, व्यवस्था आदि से उसका आभास [दीप्ति] हमारे हृदयों में होता है। तब हम उसकी ओर चलते हैं। वह हमसे (शुक्रः) = जाया जाता है [शुक् गतौ] और अन्त में उसकी ओर चलते-चलते हम उसे प्राप्त कर लेते हैं, वह (आहुत:)= हमसे समर्पित होता है। हम उसके प्रति आत्मसमर्पण करते हैं। किसी भी वस्तु की प्राप्ति का क्रम 'ज्ञान, गमन और प्राप्ति' ही है।
हमने प्रभु के प्रति अपना अर्पण किया, उसने हमें 'वृत्रविनाशरूप' कार्य के लिए शक्ति-सम्पन्न बनाया और हम इस मन्त्र के ऋषि ‘भरद्वाज कहलाये।
Essence
अनन्य भक्ति, स्तुति के अनुरूप व्यवहार से आराधित प्रभु जीव की वासनाओं का विनाश करते हैं ।
Subject
काम-संहार