Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 397

1875 Mantra
Devata- आदित्याः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡पामी꣢꣯वा꣣म꣢प꣣ स्रि꣢ध꣣म꣡प꣢ सेधत दुर्म꣣ति꣢म् । आ꣡दि꣢त्यासो यु꣣यो꣡त꣢ना नो꣣ अ꣡ꣳह꣢सः ॥३९७॥

अ꣡प꣢꣯ । अ꣡मी꣢꣯वाम् । अ꣡प꣢ । स्रि꣡ध꣢꣯म् । अ꣡प꣢꣯ । से꣣धत । दुर्मति꣢म् । दुः꣣ । मति꣢म् । आ꣡दि꣢꣯त्यासः । आ । दि꣣त्यासः । युयो꣡त꣢न । यु꣣यो꣡त꣢ । न꣣ । नः । अँ꣡ह꣢꣯सः ॥३९७॥

Mantra without Swara
अपामीवामप स्रिधमप सेधत दुर्मतिम् । आदित्यासो युयोतना नो अꣳहसः ॥

अप । अमीवाम् । अप । स्रिधम् । अप । सेधत । दुर्मतिम् । दुः । मतिम् । आदित्यासः । आ । दित्यासः । युयोतन । युयोत । न । नः । अँहसः ॥३९७॥

Samveda - Mantra Number : 397
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (आदित्यासः) = आदित्यो! निरन्तर क्रियाशीलता का उपदेश देनेवाले सूर्यो! (न:) = हमें अपनी प्रेरणा से क्रियाशील बनाकर (अहंस:) = कुटिलता से (युयोतन) = पृथक करो । तमोगुणी आलसी पुरुष अत्याधिक बदले की भावना से चलता है। वह कुटिलता की दिशा में ही सोचता है। हम आदित्यों की प्रेरणा से क्रियाशील बनकर कुटिलता से दूर हों। जिस प्रकार सूर्य सतत् क्रियाशील है इसी प्रकार हम भी क्रियाशील बनें। क्रियाशीलता ही हमें कुटिलता से बचा सकती है।

कुटिलता से बचने के साथ क्रियाशीलता के परिणामस्वरूप ये आदित्य (अभीवाम्) = ‘रोगकृमियों को हमसे (अपसेधत) = दूर करते हैं। अकर्मण्य व आलसी शरीर में ही बिमारियाँ आती हैं। व्यायामशील के समीप तो बिमारियाँ उसी प्रकार नहीं आती जैसे कि गरुड़ के समीप सर्प। हे आदित्यो! (स्त्रिधम्) = कुत्सा को, हिंसा को औरों के प्रति द्वेषादि की भावना को हमसे दूर करो। स्तुति - निन्दा में वे ही व्यक्ति चलते हैं जो अकर्मण्य होते हैं। इसी प्रकार (दुर्मतिम्) = अशुभ विचारों को हमसे दूर करो। क्रियाशील व्यक्ति का मस्तिष्क भी कभी दूषित विचारधाराओं को अपने मस्तिष्क में स्थान नहीं देता। इसीलिए हमें 'इरिम्बिठि' बनना ही चाहिए। हम थोड़ा-थोड़ा करके इस बात का अभ्यास करें कि हमारे हृदय कर्म-संकल्प वाले हों ।
Essence
मैं आदित्यों से क्रिया की प्रेरणा को प्राप्त करके रोग-कुत्सा व दुर्गति से दूर हो जाऊँ।
Subject
रोग, कुत्सा व दुर्मति का यावन