Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 395

1875 Mantra
Devata- आदित्याः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
तु꣣चे꣡ तुना꣢꣯य꣣ त꣢꣫त्सु नो꣣ द्रा꣡घी꣢य꣣ आ꣡यु꣢र्जी꣣व꣡से꣢ । आ꣡दि꣢त्यासः समहसः कृ꣣णो꣡त꣢न ॥३९५॥

तु꣣चे꣢ । तु꣡ना꣢꣯य । तत् । सु । नः꣣ । द्रा꣡घी꣢꣯यः । आ꣡युः꣢꣯ । जी꣣व꣡से꣢ । आ꣡दि꣢꣯त्यासः । आ । दि꣣त्यासः । समहसः । स । महसः कृणो꣡त꣢न । कृ꣣णो꣡त꣢ । न꣣ ॥३९५॥

Mantra without Swara
तुचे तुनाय तत्सु नो द्राघीय आयुर्जीवसे । आदित्यासः समहसः कृणोतन ॥

तुचे । तुनाय । तत् । सु । नः । द्राघीयः । आयुः । जीवसे । आदित्यासः । आ । दित्यासः । समहसः । स । महसः कृणोतन । कृणोत । न ॥३९५॥

Samveda - Mantra Number : 395
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘इरिम्बिठि काण्व' है- जिसका हृदयान्तरिक्ष गति के संकल्प से पूर्ण है [बिठ= अन्तरिक्ष, इर् = गतौ ] । यह निरन्तर गति करता हुआ थोड़ा-थोड़ा करके प्रकाश को अपने अन्दर भरने का प्रयत्न करता है, अतः 'काण्व' है। यह प्रार्थना करता है कि हे (स-महसः) = तेजस्वितावाले (आदित्यास:) = आदित्यों! (नः तत् आयु:) = हमारे उस आयुष्य को (जीवसे) = उत्तम जीवन के लिए (द्राघीयः) = विदीर्ण अन्धकारवाला [दृ-विदारणे] (सुकृणोतन) = उत्तमता से करो। दीर्घ शब्द का अर्थ लम्बा है। हिन्दी में 'चल लम्बा हो' इस मुहावरे में लम्बे होने का अर्थ भाग जाना ही है। इस भावना को लेकर भी प्रार्थना का स्वरूप यही है कि हमारे जीवन को ऐसा बनाओ जिसमें से कि अन्धकार भाग गया है। आदित्यों का विशेषण 'समहस' देकर प्रकाश के साथ तेजस्विता की याचना का भी संकेत है। हमारा जीवन प्रकाशमय व तेजस्वी हो। जीवन तो है ही वह जोकि विज्ञान व विक्रम के यशों से सम्पन्न है। इनके बिना तो जीवन लोहार की भस्त्रा = धौंकनी के समान है, वह भी तो श्वास लेती ही है।

हमारे पश्चात भी हमारा घर प्रकाश व तेज से रहित न हो, अतः मन्त्र में प्रार्थना करते हैं कि (तुचे) = हमारे पुत्रों के लिए भी प्रकाशमय जीवन दीजिए। पुत्र के पश्चात् तुनाय= पौत्र [तुन=वंश-विस्तार करनेवाला] के लिए भी प्रकाश प्राप्त कराईये । पौत्र के लिए ही क्या! अपत्यं पौत्र-प्रभृति गोत्रम' इस नियम से कि पौत्र से लेकर सब संतान गोत्र कहलाते हैं, हमारे गोत्र को आप प्रकाशमय और तजस्वी बनाएँ । 

आदित्यों से प्रार्थना का अभिप्राय यह है कि सूर्य की बारह संक्रान्तियों से बारह आदित्य कहलाते हैं और जिनसे बारह मास बनते हैं हम उन मासों के नक्षत्रवादी नामों से यह बोध लें कि १. हम इस संसार - वृक्ष की 'विशाखा' = विशिष्ट - सर्वोत्तम शाखा बनेंगे, २. यह संकल्प ही हमें ‘ज्येष्ठा' ज्येष्ठ बनाएगा, ज्येष्ठ बनने का अभिप्राय 'अषाढ़ा' काम आदि शत्रुओं से पराजित न होना है, ४. इसके लिए आवश्यक है कि 'श्रवणा ' हम विद्वानों के उपदेश का श्रवण करें, ५. यही 'भद्रपदा' कल्याण का मार्ग है, ६. इसपर चलने के लिए ‘अश्विनी'=कल-कल की [ श्व: श्व:] उपासना नहीं करनी, ७. कृत्तिका - कामादि शत्रुओं का अभी से छेदन प्रारम्भ कर देना है, ८. इन्हें ढूंढ-ढूंढ कर इनका नाश करना है, अतः हम ‘मृग-शिरस्’=ढूंढनेवालों के मुखिया बनें, ९. इन्हें नष्ट करके 'पुष्य' अपना पोषण करें, १०. जिससे हमारे जीवनों मे [मा- अघ] पाप का लवलेश न हो और यह निर्मलता के उस एश्वर्य से सम्पन्न हो जिससे कि ११. संसार का ऐश्वर्य 'ल्गुनी' फोक-सा प्रतीत हो और १२. चित्रा हमारे जीवनों में यह 'आश्चर्य' कर सकनेवाले हम बनें। 
Essence
आदित्यों से प्रेरणा प्राप्त कर के हम अपने जीवनों को प्रकाशमय बनाएँ।
Subject
प्रकाशमय जीवन