Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 394

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पर्वतः काण्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡ इ꣢न्द्र सोम꣣पा꣡त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ शविष्ठ꣣ चे꣡त꣢ति । ये꣢ना꣣ ह꣢ꣳसि न्या꣢꣯३꣱त्रिणं त꣡मी꣢महे ॥३९४॥

यः꣢ । इ꣣न्द्र । सोमपा꣡त꣢मः । सो꣣म । पा꣡त꣢꣯मः । म꣡दः꣢꣯ । श꣣विष्ठ । चे꣡त꣢꣯ति । ये꣡न꣢꣯ । हँ꣡सि꣢꣯ । नि । अ꣣त्रि꣡ण꣢म् । तम् । ई꣣महे ॥३९४॥

Mantra without Swara
य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति । येना हꣳसि न्या३त्रिणं तमीमहे ॥

यः । इन्द्र । सोमपातमः । सोम । पातमः । मदः । शविष्ठ । चेतति । येन । हँसि । नि । अत्रिणम् । तम् । ईमहे ॥३९४॥

Samveda - Mantra Number : 394
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र की भावना के अनुसार पर्वत की भाँति विशाल [Grand] बनकर यह 'पर्वत' ही बन गया है। यह पर्वत बनने की साधना कण-कण करके हुई, अतः यह ‘काण्व' है। प्रभु इससे कहते हैं कि हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता और अतएव (शविष्ठ) = अत्यन्त शक्तिसम्पन्न जीव! (यः) = जो (सोमपातम:) = सोम [Vitality ] का अधिक से अधिक पान करनेवाला तेरा (मदः )= गौरव का अनुभव (चेतति) = तुझे चेतनामय बनाता है - जागरित करता है, और इसलिए तुझे प्रमाद की मदिरा पीकर उन्मत्त नहीं होने देता, हम तो तेरे (तम्) = उसी मद को (ईमहे) = चाहते हैं। वस्तुतः प्रभु जीव से यही चाहते हैं कि वह 'इन्द्रियों का अधिष्ठाता बने, सोम का अधिक-से-अधिक पान करे, गौरव का अनुभव करें, शक्तिशाली बनें, और सदा चेतना में रहे-अपने स्वरूप को भूल न जाए।

जिस समय जीव अपने स्वरूप को भूलता नहीं तब वह चित्तवृत्तियों को अपने पर प्रबल नहीं होने देता—यह कभी क्रोध के वश में नहीं हो जाता । इसी से मन्त्र में कहते हैं कि हम तेरे उस मद को चाहते हैं (येन) = जिससे तू (अत्रिणम्) = अपने आधार को खा जानेवाले [अद् भक्षणे] इस क्रोध को (निहंसि) = निश्चय से मार डालता है। सोम का पान करनेवाला शक्तिशाली पुरुष क्रोधाभिभूत होता ही नहीं। क्रोध को अत्रि कहा है क्योंकि क्रोध करनेवाला इस क्रोध से शतशः नाड़ी संस्थान के रोगों से पीड़ित हो जाता है। यह क्रोध उसे खा-सा जाता है, परन्तु जब मनुष्य संयम से उत्पन्न अपने गौरव की भावना से भर जाता है तो क्रोध को कुचल देता है और प्रभु का प्रिय बनता है।
Essence
मैं क्रोध को अपने गौरव से गिरा हुआ समझँ और कभी उसके वश में न होऊँ।
Subject
अत्रि निहनन