Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 390

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
स꣡खा꣢य꣣ आ꣡ शि꣢षामहे꣣ ब्र꣡ह्मेन्द्रा꣢꣯य व꣣ज्रि꣡णे꣢ । स्तु꣣ष꣢ ऊ꣣ षु꣢ वो꣣ नृ꣡त꣢माय धृ꣣ष्ण꣡वे꣢ ॥३९०॥

स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । आ꣢ । शि꣣षामहे । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । व꣣ज्रि꣡णे꣢ । स्तु꣣षे । उ꣣ । सु꣢ । वः꣣ । नृ꣡त꣢꣯माय । धृ꣣ष्ण꣡वे꣢ ॥३९०॥

Mantra without Swara
सखाय आ शिषामहे ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे । स्तुष ऊ षु वो नृतमाय धृष्णवे ॥

सखायः । स । खायः । आ । शिषामहे । ब्रह्म । इन्द्राय । वज्रिणे । स्तुषे । उ । सु । वः । नृतमाय । धृष्णवे ॥३९०॥

Samveda - Mantra Number : 390
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(विश्वमनाः) = व्यापक मनवाला (वैयश्वः) = उत्तम इन्द्रियरूपी घोड़ोंवाला इस मन्त्र का ऋषि कहता है कि (सखायः) = मित्रो ! हम (इन्द्राय) = सर्वशक्ति सम्पन्न और (वज्रिणे) = सदा स्वाभाविक क्रियावाले प्रभु के लिए (ब्रह्म) = स्तोत्र को (आशिषामहे) = चाहते हैं । अर्थात् हम सब मिलकर उस प्रभु का स्तवन करें। प्रभु के स्तवन से हमारे अन्दर भी शक्ति का संचार होगा और हम भी स्वाभाविक रूप से क्रिया करने की प्रवृत्तिवाले होंगे।

एवं विश्वमना सबको प्रेरणा देकर कहता है कि मैं तो (उ) = निश्चय से उस प्रभु का (सुस्तुषे) = पूजा की भावना से स्तवन करता ही हूँ जोकि (व:) = तुम्हें (नृतमाय) = सबसे अधिक आगे ले-चलनेवाले हैं और इस उन्नति के मार्ग में आनेवाले शतशः विघ्नों का धृष्णवे=धर्षण करनेवाले हैं। मैं तो उसकी स्तुति करता ही हूँ।
Essence
प्रभु के स्तवन के लिए में अपने सब साथियों को प्रेरित करूँ और प्रभु-स्तवन में लग जाऊँ।
Subject
आओ, मिलकर उसका स्तवन करें