Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 388

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ सा꣡म꣢ गायत꣣ वि꣡प्रा꣢य बृह꣣ते꣢ बृ꣣ह꣢त् । ब्र꣣ह्मकृ꣡ते꣢ विप꣣श्चि꣡ते꣢ पन꣣स्य꣡वे꣢ ॥३८८॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सा꣡म꣢꣯ । गा꣣यत । वि꣡प्रा꣢꣯य । वि । प्रा꣣य । बृहते꣢ । बृ꣣ह꣢त् । ब्र꣣ह्मकृ꣡ते꣢ । ब्र꣣ह्म । कृ꣡ते꣢꣯ । वि꣣पश्चि꣡ते꣢ । वि꣣पः । चि꣡ते꣢꣯ । प꣣नस्य꣡वे꣢ ॥३८८॥

Mantra without Swara
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत् । ब्रह्मकृते विपश्चिते पनस्यवे ॥

इन्द्राय । साम । गायत । विप्राय । वि । प्राय । बृहते । बृहत् । ब्रह्मकृते । ब्रह्म । कृते । विपश्चिते । विपः । चिते । पनस्यवे ॥३८८॥

Samveda - Mantra Number : 388
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'नृमेध - आङ्गिरस' है- मनुष्यों के साथ मिलकर चलनेवाला, शक्तिशाली। सबको अपना ही समझनेवाला राग-द्वेष से ऊपर उठ जाता है। इस भावना का पूर्ण विकास प्रभु-स्तवन से ही होता है । 'सब में आत्मा और सब आत्मा में' यह चिन्तन हमें एकत्व का अनुभव कराता है। इसी से नृमेध कहता है कि उस प्रभु के लिए (बृहत् साम गायत) = बृहत साम का गायन करो। सोमों में प्रभु के गुणों का गान है। सामों में भी 'बृहतत्साम' का विशेष महत्व है। ये साम प्रभु के गुणों को हमारे सामने उपस्थित करके हमें भी उन गुणों को अपने जीवन का अङ्ग बनाने की प्रेरणा देते हैं। उस प्रभु के लिए हम गायन करें जो कि

१. (इन्द्राय) = परमैश्वर्यशाली हैं, बल के कार्यों को करनेवाले हैं और असुरों का संहार करते हैं। प्रभु के सम्पर्क में आकर हम भी परमैश्वर्य को प्राप्त करेंगे, शक्तिशाली होंगे और आसुर वृत्तियों को समाप्त कर पाएँगे।

२. (विप्राय) = विप्र के लिए। वे प्रभु वि-प्र- विशेषरूप से हमारी कमियों को दूर करनेवाले हैं। जैसे एक चित्रकार अपने निर्मित चित्र को अन्तिम स्पर्श [finishing touch] देता है, इसी प्रकार प्रभु स्तवन हमारे जीवन - चित्रों की सूक्ष्मतम न्युनताओं को दूर कर देता है। ३. (बृहते) = सदा वर्धमान के लिए। वे प्रभु हमारी न्यूनताओं को दूर करके सब प्रकार से हमारा वर्धन करते हैं।

४. (ब्रह्मकृते) = ब्रह्मकृत के लिए। वे प्रभु हमारी अन्तरात्मा में स्थित हुए-हुए उसमें वेदज्ञान का प्रकाश करते हैं ।

५. (विपश्चिते) = विपश् चित् के लिए । प्रभु के स्तोता के अन्द भी सदा वस्तुओं को सूक्ष्मता से, गहराई तक देखकर सोचने की वृत्ति उत्पन्न होती है।

६. (पनस्यवे) = स्तुति को चाहनेवाले के लिए। जैसे एक पिता स्वयं मान का भूखा न भी होता हुआ भी सन्तानों में विनीतता चाहता है कि वे ('मातृदेव व पितृदेव') = हों, उसी प्रकार जीवों के हित के लिए ही प्रभु चाहते हैं कि जीवन उनका उपासक हो और प्रकृति की ओर झुकाववाला न हो।
Essence
हम प्रभु का स्तवन करते हुए ऐश्वर्य व बल के स्वामी होकर असुरों का संहार करें, न्यूनताओं को दूर कर वृद्धिशील हों। अन्दर ज्ञान के प्रकाश को देखते हुए वस्तुतत्त्व को देखकर चिन्तन करनेवाले बनें और प्रभु - प्रवण हों । यही आध्यात्मिकता
Subject
स्तुति क्यों?