Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 385

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣢दु꣣ म꣡धो꣢र्म꣣दि꣡न्त꣢रꣳ सि꣣ञ्चा꣡ध्व꣣र्यो꣣ अ꣡न्ध꣢सः । ए꣣वा꣢꣫ हि वी꣣र꣡स्तव꣢꣯ते स꣣दा꣡वृ꣢धः ॥३८५॥

आ꣢ । इत् । उ꣣ । म꣡धोः꣢꣯ । म꣣दि꣡न्त꣢रम् । सि꣣ञ्च꣢ । अध्व꣣र्यो । अ꣡न्ध꣢꣯सः । ए꣣व꣢ । हि । वी꣣रः꣢ । स्त꣡व꣢꣯ते । स꣣दा꣡वृ꣢धः । स꣣दा꣢ । वृ꣣धः ॥३८५॥

Mantra without Swara
एदु मधोर्मदिन्तरꣳ सिञ्चाध्वर्यो अन्धसः । एवा हि वीरस्तवते सदावृधः ॥

आ । इत् । उ । मधोः । मदिन्तरम् । सिञ्च । अध्वर्यो । अन्धसः । एव । हि । वीरः । स्तवते । सदावृधः । सदा । वृधः ॥३८५॥

Samveda - Mantra Number : 385
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
उल्लिखित सब प्रकार की वीरताओं को प्राप्त करने के लिए हे (अध्वर्यो) = जीवन को हिंसाशून्य यज्ञरूप बनानेवाले जीव! (मधो:) = मधु से भी (मदिन्तरम्) = अधिक मद का अनुभव करानेवाले (अन्धसः) = [आध्यातव्य] सोम का (इत् उ) = निश्चय से (आसिञ्च) = अपने में सेंचन कर। इस सोम को नष्ट न होने दे । (एवा) = इस प्रकार ही (हि) = निश्चय से (वीरः) = तू वीर बनेगा और (सदावृधः) = सदा वर्धनवाला होगा।

सोम ही वह शक्ति है जो कि सब उन्नतियों के मूल में है। इसके बिना किसी प्रकार की उन्नति सम्भव नहीं। यही जड़ जगत् की सर्वोत्तम वस्तु है, जोकि चेतन जगत् की सर्वोत्तम वस्तु प्रभु को प्राप्त कराती है। इसलिए सबसे बड़ा वीर तो वही है जो कि सोम के संयम में वीर बना है। यही वीर (स्तवते) = सदा स्तुत होता है - प्रभु की प्रशंसा का पात्र होता है। उसकी मनोवृत्ति व्यापक होती है, सो यह ‘विश्वमनाः' कहलाता है। और इसकी सब इन्द्रियाँ विशिष्टता को लिये होती हैं सो यह ‘वैयश्च' कहलाता है। यह ‘सदावृध' है सदा आगे और आगे चल रहा है। पिछले दो मन्त्रों के साथ मिलकर इस मन्त्र तक नौ शूरवीरों का उल्लेख हो गया है। ये वीर ही प्रभु से आदर पाते हैं - प्रभु के प्रिय बनते हैं।
Essence
मैं सोम के सिञ्चन में वीर बनकर सदावृध बनूँ। इसके लिएए मैं अध्वर्यू- -सदा अहिंसक अनुत्तेजित रहूँ। जितेन्द्रियता और अनुत्तेजना से ही सोम-पान सम्भव होगा।
 
Subject
शूर सदावृध है