Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 374

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
च꣣र्षणीधृ꣡तं꣢ म꣣घ꣡वा꣢नमु꣣क्थ्या꣢३꣱मि꣢न्द्रं꣣ गि꣡रो꣢ बृह꣣ती꣢र꣣꣬भ्यनू꣢꣯षत । वा꣣वृधानं꣡ पु꣢रुहू꣣त꣡ꣳ सु꣢वृ꣣क्ति꣢भि꣣र꣡म꣢र्त्यं꣣ ज꣡र꣢माणं दि꣣वे꣡दि꣢वे ॥३७४॥

च꣣र्षणीधृ꣡त꣢म् । च꣣र्षणि । धृ꣡त꣢꣯म् । म꣣घ꣡वा꣢नम् । उ꣣क्थ्य꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । गि꣡रः꣢꣯ । बृ꣣हतीः꣢ । अ꣣भि꣢ । अ꣣नूषत । वावृधान꣢म् । पु꣣रुहूत꣢म् । पु꣣रु । हूत꣢म् । सु꣣वृक्ति꣡भिः꣢ । सु꣣ । वृक्ति꣡भिः꣢ । अ꣡म꣢꣯र्त्यम् । अ । म꣣र्त्यम् । ज꣡र꣢꣯माणम् । दि꣣वे꣡दि꣢वे । दि꣣वे꣢ । दि꣣वे ॥३७४॥

Mantra without Swara
चर्षणीधृतं मघवानमुक्थ्या३मिन्द्रं गिरो बृहतीरभ्यनूषत । वावृधानं पुरुहूतꣳ सुवृक्तिभिरमर्त्यं जरमाणं दिवेदिवे ॥

चर्षणीधृतम् । चर्षणि । धृतम् । मघवानम् । उक्थ्यम् । इन्द्रम् । गिरः । बृहतीः । अभि । अनूषत । वावृधानम् । पुरुहूतम् । पुरु । हूतम् । सुवृक्तिभिः । सु । वृक्तिभिः । अमर्त्यम् । अ । मर्त्यम् । जरमाणम् । दिवेदिवे । दिवे । दिवे ॥३७४॥

Samveda - Mantra Number : 374
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(बृहतीः) = हमारा वर्धन करनेवाली (गिर:) = वेदवाणियाँ (अभ्यनूषत) = उसी प्रभु का लक्ष्य करके स्तवन करती हैं, अर्थात् सभी वेदवाणियों अन्ततोगत्वा उस प्रभु का ही प्रतिपादन कर रही हैं। किस प्रभु का? १. (चर्षणीधृतम्) = जो सब मनुष्यों का धारण करनेवाले हैं। चर्षणी शब्द, उस मनुष्य का द्योतक है जो उत्पादक कार्य में लगा हुआ है, परमेश्वर उसका धारण करते ही हैं। २. (मघवानम्) = जो प्रभु पाप के लेश से भी शून्य ऐश्वर्यवाले हैं, ४. (इन्द्रम्) = शक्ति के सब कार्यों को करनेवाले हैं, असुरों का संहार करनेवाले हैं, ५. (वावृधानम्) = अपने स्वरूप में निरन्तर वृद्धि को प्राप्त और ६. (पुरुहूतम्) = जिनकी पुकार पालक व पूरक है, ७. (अमर्त्यम्) = जो किसी भी वस्तु के पीछे मर नहीं रहे अर्थात जो अनासक्त हैं, ७. और अन्त में (दिवेदिवे) = प्रतिदिन (सुवृक्तिभिः) = उत्तम वर्जनों के द्वारा - त्याग के द्वारा (जरमाणम्) = स्तुति किये जा रहे हैं।

स्तुति का अभिप्राय उन गुणों को अपने में धारण करने से होता है, अतः हमें चाहिए कि हम उत्पादक श्रम में सहयोग दें, सुपथ से धनार्जन करें, स्तुतिवचनों को ही मुख से उच्चरित करें, आसुर वृत्तियों का संहार करें, छोटे न बनें अपने दिलों को छोटा न करें, हमारे प्रति किसी की भी पुकार व्यर्थ न जाए और आसक्ति ऊपर उठें।

उल्लिखित प्रकार से अपने जीवन को बिताते हुए हम इस तत्त्व को न भूलें कि हम उस-उस व्यसन को छोड़कर ही प्रभु का सच्चा स्तवन कर पाते हैं। इस प्रकार इन काम-क्रोधादि की भावनाओं को छोड़नेवाला ही सबके प्रति स्नेहवाला इस मन्त्र का ऋषि ‘विश्वामित्र' बन पाता है और यही प्रभु का सच्चा गायक ‘गाथिन' है।
Essence
हम वासनाओं को छोड़कर प्रभु को पाने के लिए प्रयत्नशील हों। 
Subject
छोड़ें और पायें