Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 370

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- रेभः काश्यपः Chhand- अति जगती Swara- निषादः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वि꣢श्वाः꣣ पृ꣡त꣢ना अभि꣣भू꣡त꣢रं꣣ न꣡रः꣢ स꣣जू꣡स्त꣢तक्षु꣣रि꣡न्द्रं꣢ जज꣣नु꣡श्च꣢ रा꣣ज꣡से꣢ । क्र꣢त्वे꣣ व꣡रे꣢ स्थे꣢म꣢न्या꣣मु꣡री꣢मु꣣तो꣡ग्रमोजि꣢꣯ष्ठं त꣣र꣡सं꣢ तर꣣स्वि꣡न꣢म् ॥३७०॥

वि꣡श्वाः꣢꣯ । पृ꣡त꣢꣯नाः । अ꣣भिभू꣡त꣢रम् । अ꣣भि । भू꣡त꣢꣯रम् । न꣡रः꣢꣯ । स꣣जूः꣢ । स꣣ । जूः꣢ । त꣣तक्षुः । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ज꣣जनुः꣢ । च꣣ । राज꣡से꣢ । क्र꣡त्वे꣢꣯ । व꣡रे꣢꣯ । स्थे꣣म꣡नि꣢ । आ꣣मु꣡री꣢म् । आ꣣ । मु꣡री꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । उ꣣ग्र꣢म् । ओ꣡जि꣢꣯ष्ठम् । त꣣र꣡स꣢म् । त꣣रस्वि꣡न꣢म् ॥३७०॥

Mantra without Swara
विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरः सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे । क्रत्वे वरे स्थेमन्यामुरीमुतोग्रमोजिष्ठं तरसं तरस्विनम् ॥

विश्वाः । पृतनाः । अभिभूतरम् । अभि । भूतरम् । नरः । सजूः । स । जूः । ततक्षुः । इन्द्रम् । जजनुः । च । राजसे । क्रत्वे । वरे । स्थेमनि । आमुरीम् । आ । मुरीम् । उत । उग्रम् । ओजिष्ठम् । तरसम् । तरस्विनम् ॥३७०॥

Samveda - Mantra Number : 370
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में 'विद्या + श्रद्धा' का उल्लेख था। इस मन्त्र का ऋषि उन दोनों तत्त्वों का मेल करनेवाला रेभ [श्रद्धा] =स्तोता और काश्यप [विद्या] =ज्ञानी है। यह कहता है कि (नरः) = अपने को आगे ले-चलनेवाले मनुष्यो! (विश्वाः पृतना:) = सब संग्रामों में शत्रुओं को (अभि भूतरम्) = अत्यधिक कुचल डालनेवाले (इन्द्रम्) = सर्वशक्तिमान् प्रभु को (सजू:) = आपस में मिलकर प्रीतिपूर्वक (ततक्षुः) = बनाओ। सृष्टि के तत्त्वों का विचार करते हुए उस प्रभु का कुछ विचार अपने अन्दर उत्पन्न करो। (च) = और उसकी सत्ता का विचार बनाकर उस विचार को (जजनुः) = प्रादुर्भूत करो- विकसित करो जिससे (राजसे) = तुम्हें दीप्ति प्राप्त हो । जिस समय प्रभु की सत्ता व महिमा का विचार हमारे हृदयों में पुष्पित होता है उस समय ऐ दीप्ति का अनुभव होता है-इस दीप्ति से इस स्तोता का चेहरा भी दीप्त हो उठता है। उत और, इस प्रभु के विचार को विकसित करके (वरे क्रत्वे) = उत्तम कर्म व संकल्पों में (स्थेमनि) = स्थिरता के लिए (ईम्) = निश्चय से (आमुः) = उस प्रभु की ओर चलते हैं [अम् गतौ] । जो मनुष्य प्रभु की चल पड़ता उसका जीवन कभी भी अशुभकर्म धारा में प्रवाहित नहीं होता। 

वे प्रभु तो हमारे लिए (तरसम्) = एक बेड़े के रूप में हैं [तरस्-Raft] जो बेड़ा (तरस्विनम्) = शक्तिशाली–दृढ़ भी है और तीव्र गतिवाला भी है [Strong and Swift]। यज्ञरूप बेड़े भी उत्तम हैं, परन्तु वे अदृढ़ हैं। यह प्रभुरूप नाव दृढ़ है। (उग्रम्) = यह हमें निरन्तर आगे और आगे ले-चलती है और (ओजिष्ठम्) - हमारी वृद्धि व उन्नति का हेतु है। [ओज् = to increase]। इस नाव का आश्रय करके हम कल्याणपूर्वक परले पार पहुँच जाएँगे।
 
Essence
हम अपने हृदय में सर्वशक्तिमान् प्रभु का विचार उत्पन्न करें, उसे विकसित करें और प्रभु की ओर चलनेवाले बनें।
Subject
दृढ़ तीव्रगतिवाली नौका [ The Strong Swift Ship ]