Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 368

1875 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣मी꣡ ये दे꣢꣯वा꣣ स्थ꣢न꣣ म꣢ध्य꣣ आ꣡ रो꣢च꣣ने꣢ दि꣣वः꣢ । क꣡द्ध꣢ ऋ꣣तं꣢꣫ कद꣣मृ꣢तं꣣ का꣢ प्र꣣त्ना꣢ व꣣ आ꣡हु꣢तिः ॥३६८॥

अ꣣मी꣡इति꣢ । ये दे꣣वाः । स्थ꣡न꣢꣯ । स्थ । न꣣ । म꣡ध्ये꣢꣯ । आ । रो꣣चने꣢ । दि꣣वः꣢ । कत् । वः꣣ । ऋत꣢म् । कत् । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । का꣢ । प्र꣣त्ना꣢ । वः꣢ । आ꣡हु꣢꣯तिः । आ । हु꣣तिः ॥३६८॥

Mantra without Swara
अमी ये देवा स्थन मध्य आ रोचने दिवः । कद्ध ऋतं कदमृतं का प्रत्ना व आहुतिः ॥

अमीइति । ये देवाः । स्थन । स्थ । न । मध्ये । आ । रोचने । दिवः । कत् । वः । ऋतम् । कत् । अमृतम् । अ । मृतम् । का । प्रत्ना । वः । आहुतिः । आ । हुतिः ॥३६८॥

Samveda - Mantra Number : 368
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में नियमित जीवन-ऋत का उल्लेख हुआ था। इस मन्त्र में ऋत के साथ दो अगली सीढ़ियों का भी उल्लेख करते हैं, जिनसे हम द्युलोक का आरोहण करके देव बन जाएँगे। असुर्य लोकों से ऊपर उठकर हम मनुष्य बने हैं। अब इस पृथिवीलोक से भी ऊपर उठकर हमें अन्तरिक्षलोकवासी देवयोनियों में पहुँचना है, और वहाँ से ऊपर उठकर द्युलोक के देव बनना है। उन द्युलोक के देवो को सम्बोधन करते हुए इस मन्त्र का ऋषि त्रित, जिसने असुर्य, मानव, देवयोनि इन तीनों लोकों को तैर जाना है और तैरकर जो देवलोक को प्राप्त करनेवालों में श्रेष्ठ 'आप्त्य' बनेगा। यह आप्त्य देवों से कहता है कि (अभि ये देवा:) = वे जो देव दिवः-द्युलोक के आराचने मध्ये समन्तात् दीप्त मध्यभाग में स्थन- हो (वः) तुम्हें (कत्) = शिर:स्थान में अथवा सुखमय स्थिति में पहुँचानेवाला (ऋतम्) = ऋत ही तो है, (कत्) = उसी प्रकार तुम्हारी उच्च स्थिति करनेवाला अथवा सुखी बनानेवाला (अमृतम्) = अमृत ही तो है। और अन्त में (वः) = आपकी (प्रत्ना) = प्राचीन होते भी नवीन अर्थात् निरन्तर चलनेवाली (आहुति) = प्राजापात्ययज्ञ में सर्ववेदस की आहुति का आपको शिखर पर पहुँचाकर स्वर्ग प्राप्त करानेवाली हुई है। 

१. ‘ऋत’ का अभिप्राय नियमित जीवन है, यह युक्ताहारविहारवाला नियमित जीवन हमें पृथिवीलोक के विजय के योग्य बनाता है। ऋत का पालन करके हम इस पृथिवीलोक पर जहाँ उन्नत होते हैं, वहाँ सुखी जीवनवाले भी होते हैं।

२. अमृतम् का अभिप्राय है 'यज्ञशेष' [यज्ञशेषं तथामृतम्] । पञ्चयज्ञ करके बचे हुए का सेवन करनेवाले अन्तरिक्षलोक का विजय करते हैं। हमारा जन्म किसी अन्तरिक्ष के पिण्ड में होता है। ‘अपञ्चयज्ञो मलिम्लुचः'=पञ्चयज्ञ न करके हम चोर होते हैं- अन्तरिक्षलोक में पहुँचने का तो प्रश्न ही क्या ?

३. अन्त में प्राजापत्य यज्ञ में सम्पूर्ण धन की आहुति देकर हम 'देवलोक' में पहुँचने के अधिकारी बनते हैं। सूर्य मण्डल का भेदन करनेवाला यही संन्यासी होता है। उल्लिखित प्रकार से 'ऋत, अमृत, आहुति' एक सीढ़ी बन जाती है जो हमें ऊपर और ऊपर जाने में समर्थ करती है।
Essence
मेरा जीवन 'ऋत का पालन करे, अमृत का सेवन करे और आहुति देनेवाला हो। 
Subject
ऋत, अमृत, आहुति