Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 362

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡र्च꣢त꣣ प्रा꣡र्च꣢ता नरः꣣ प्रि꣡य꣢मेधासो꣣ अ꣡र्च꣢त । अ꣡र्च꣢न्तु पुत्र꣣का꣢ उ꣣त꣢꣫ पुर꣣मि꣢द्धृ꣣꣬ष्ण्व꣢꣯र्चत ॥३६२॥

अ꣡र्च꣢꣯त । प्र । अ꣣र्चत । नरः । प्रि꣡य꣢꣯मेधासः । प्रि꣡य꣢꣯ । मे꣣धासः । अ꣡र्च꣢꣯त । अ꣡र्च꣢꣯न्तु । पु꣣त्रकाः꣢ । पु꣣त् । त्रकाः꣢ । उ꣣त꣢ । पु꣡र꣢꣯म् । इत् । धृ꣣ष्णु꣢ । अ꣣र्चत ॥३६२॥

Mantra without Swara
अर्चत प्रार्चता नरः प्रियमेधासो अर्चत । अर्चन्तु पुत्रका उत पुरमिद्धृष्ण्वर्चत ॥

अर्चत । प्र । अर्चत । नरः । प्रियमेधासः । प्रिय । मेधासः । अर्चत । अर्चन्तु । पुत्रकाः । पुत् । त्रकाः । उत । पुरम् । इत् । धृष्णु । अर्चत ॥३६२॥

Samveda - Mantra Number : 362
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
रस्तुत मन्त्र में मुक्तात्मा बनने क साधनों का उल्लेख है। ‘अर्च पूजायाम्' धातु से बनी क्रिया का इस मन्त्र में पाँच बार प्रयोग उस पूजा का संकेत कर रहा है। (नरः) = हे आगे बढ़ने की वृत्तिवाले व्यक्तियों ! (प्रियमेधासः) = जिन्हें बुद्धि प्रिय है ऐसे व्यक्तियों! (अर्चत) = पूजा करो। पूजा का क्रम निम्न है -

१. (अर्चत) = पूजा करो, आदर करो। माता को देवता समझो, क्योंकि चरित्र का निर्माण मातृकृपा से ही होता है।

२. (प्रार्चता) = खूब आदर करो। पिताजी जिस प्रकार निर्देश करें उसी प्रकार सभा-समाजों में अपने उठने-बैठने का ध्यान करो। इन निर्देशों की अवहेलना से हम अपने जीवनों में शिष्ट न बन पाएँगे, हम कुछ अशिष्ट [ill-mannered] - से, अभद्र-से बने रहेंगे। 

३. इसके पश्चात् हम (अर्चते) = आचार्यों का आदर करें। हम उनको उचित आदर देकर उनके प्रिय बनते हैं और ऊँचे-से-ऊँचे ज्ञान को प्राप्त करनेवाले होते हैं।

४. (उत) = अब गृहस्थ में आने पर विद्वान् अतिथियों के (पुत्रका:) = पुत्र-तुल्य ये गृहस्थी अर्चन्तु उन व्रती विद्वानों का आदर करें। उनका आदर करने से घर स्वर्गतुल्य बना रहता है। परस्पर वैमनस्य उत्पन्न नहीं होता और जीवन में माधुर्य विद्यमान रहता है । इस अर्चन से कुलधर्म नष्ट नहीं होते।

५. इन सब पुजाओं के अतिरिक्त (इत्) = निश्चय से (पुरम्) = उस पूरण करनेवाले सब प्रकार की न्युनताओं को दूर करनेवाले (धृष्णु) = काम, क्रोध, लोभ आदि की सब वासनाओं का धर्षण करनेवाले प्रभु की (अर्चत) =  उपासना करो। इस प्रभु की उपासना के अभाव में ही भद्र होते हुए भी अभद्र से रह जाते हैं - हम काम से ऊपर नहीं उठ पाते।

‘प्रियमेध आङ्गिरस’ तो वही बन सकता है जो पाँच वर्ष तक माता, आठ वर्ष तक पिता, पच्चीस वर्ष तक आचार्य, पचास वर्ष तक अतिथियों व अग्रिम जीवन में प्रभु के निर्देशों के अनुसार जीवन को बिताने का ध्यान करे।

मातृअर्चन से चरित्र, पितृ अर्चन से शिष्टाचार, आचार्यर्चन से बुद्धि और ज्ञान, अतिथि अर्चन से कुलधर्म का और अविनाशी प्रभु-अर्चन से पालन, पूरण तथा वासना-धर्षण सिद्ध होता है।
Essence
पञ्चायतन पूजा हमारे जीवन को सर्वांग सम्पूर्ण बनानेवाली हो।
Subject
पञ्चायतन पूजा