Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 359

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- जेता माधुच्छन्दसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
पु꣣रां꣢ भि꣣न्दु꣡र्युवा꣢꣯ क꣣वि꣡रमि꣢꣯तौजा अजायत । इ꣢न्द्रो꣣ वि꣡श्व꣢स्य꣣ क꣡र्म꣢णो ध꣣र्त्ता꣢ व꣣ज्री꣡ पु꣢रुष्टु꣣तः꣡ ॥३५९॥

पु꣣रा꣢म् । भि꣣न्दुः꣢ । यु꣡वा꣢꣯ । क꣣विः꣢ । अ꣡मि꣢꣯तौजाः । अ꣡मि꣢꣯त । ओ꣣जाः । अजायत । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वि꣡श्व꣢꣯स्य । क꣡र्म꣢꣯णः । ध꣣र्त्ता꣢ । व꣣ज्री꣢ । पु꣣रुष्टुतः꣢ । पु꣣रु । स्तुतः꣢ ॥३५९॥

Mantra without Swara
पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत । इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्त्ता वज्री पुरुष्टुतः ॥

पुराम् । भिन्दुः । युवा । कविः । अमितौजाः । अमित । ओजाः । अजायत । इन्द्रः । विश्वस्य । कर्मणः । धर्त्ता । वज्री । पुरुष्टुतः । पुरु । स्तुतः ॥३५९॥

Samveda - Mantra Number : 359
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जीव तीन दीवारोंवाले एक किले के अन्दर कैद है। इन्हें ही 'स्थूल, सूक्ष्म व कारण शरीर' कहा जाता है। स्थूलशरीर तो समय पाकर स्वयं ही समाप्त हो जाता है और कारण - - शरीर प्रकृतिरूप होने से इतना व्यापक है कि वह बन्धनरूप प्रतीत नहीं होता। बीच का सूक्ष्म शरीर जो कि 'इन्द्रियों, मन और बुद्धि' से बना हुआ है यही जीव के बन्ध का सबसे बड़ा कारण है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि ही असुरों के आक्रमण से आक्रान्त होकर असुरपुरियाँ बन जाती हैं और जीव का बन्धनागार हो जाती हैं। जीव का कर्त्तव्य है कि वह इन काम-क्रोध-लोभ को जीते और इस प्रकार इन असुरपुरियों का ध्वंस कर दे । जिष्णु तो इसने बनना ही है, इन पुरियों का विदारण करके ही तो ऐसा बनेगा मन्त्र में कहते हैं (पुरां भिन्दुः) = इन असुरनगरियों का भेदन करनेवाला ही (इन्द्रः) = इन्द्र है । इन्द्र के द्वारा ही सब असुरों के विध्वंस का वर्णन है। इन्द्र देव सम्राट् हैं - असुरों का संहार करनेवाला है।

इस असुर-संहार के लिए ही इसे (युवा) = [यु= मिश्रण, अमिश्रण] बुराई को अपने से दूर करना है और अच्छाई को अपने से जोड़ना है। ('सं मा भद्रेण पंक्तम् विमापाप्माना पंक्तम्) । इसके लिए यह तभी सम्भव होगा यदि यह (विश्वस्य कर्मणो धर्ता) = सबके हित के कर्मों का धारण करनेवाला बनेगा। जितना - जितना स्वार्थ कम होकर परार्थ का अंश इसमें बढ़ता जाएगा उतना - उतना भद्र से युक्त और अभद्र से दूर होकर युवा बनता जाएगा।

भद्र से मेल व अभद्र से पार्थक्य साधन के लिए इसे (कवि:) = क्रान्तदर्शी बनना है। वस्तुओं के तात्त्विक विवेचन से ही यह दुरितों से दूर और सुवितों के समीप होगा। धर्माधर्म का विवेक ही इसके अन्दर अधर्म के प्रति वैराग्य पैदा कर सकता है। कवि बनकर यह (वज्री) = निरन्तर क्रियाशील भी बनता है। कवि संसार के इस तत्त्व को समझ लेता है कि क्रियाशीलता ही संसार है। संसार के इस तत्त्व को समझनेवाला यह कवि (वज्री) = गतिशील क्यों न होगा?

इस प्रकार तत्वज्ञान के कारण भोगमार्ग से सदा दूर रहने के कारण यह (अमितौजा:) = अनन्त शक्तिवाला (अजायत) = बनता है [अमित ओजस्] और इस अनन्त शक्ति से (पुरुष्टुतः) = सदा स्तुत होता है। अथवा इस अनन्त शक्ति के लिए यह सदा [पुरुस्तुतं यस्य] प्रभु की स्तुति में लगा रहता है। प्रभु से दूर होना ही तो इसे प्रकृति में फंसाकर निर्बल कर देता है। इस प्रकार सदा प्रभु के साथ रहनेवाला यह विजयी तो बनता ही है, अतः ‘जेता' कहलाता है और सदा उत्तम इच्छाओंवाला बने रहने के कारण यह ‘मधुच्छन्दस्' होता है। 
Essence
हम प्रयत्न करें कि हम असुर- पुरियों का विध्वंस करके मुक्त हो सकें।
Subject
असुर पुरियों का विध्वंस