Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 357

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्य꣡मु꣢ वो꣣ अ꣡प्र꣢हणं गृणी꣣षे꣡ शव꣢꣯स꣣स्प꣡ति꣢म् । इ꣡न्द्रं꣢ विश्वा꣣सा꣢हं꣣ न꣢र꣣ꣳ श꣡चि꣢ष्ठं वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् ॥३५७॥

त्य꣢म् । उ꣣ । वः । अ꣡प्र꣢꣯हणम् । अ । प्र꣣हणम् । गृणीषे꣢ । श꣡व꣢꣯सः । प꣡ति꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । विश्वा꣣सा꣡ह꣢म् । वि꣣श्वा । सा꣡ह꣢꣯म् । न꣡र꣢꣯म् । श꣡चि꣢꣯ष्ठम् । वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् । वि꣣श्व꣢ । वे꣣दसम् ॥३५७॥

Mantra without Swara
त्यमु वो अप्रहणं गृणीषे शवसस्पतिम् । इन्द्रं विश्वासाहं नरꣳ शचिष्ठं विश्ववेदसम् ॥

त्यम् । उ । वः । अप्रहणम् । अ । प्रहणम् । गृणीषे । शवसः । पतिम् । इन्द्रम् । विश्वासाहम् । विश्वा । साहम् । नरम् । शचिष्ठम् । विश्ववेदसम् । विश्व । वेदसम् ॥३५७॥

Samveda - Mantra Number : 357
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु कहते हैं कि (वः) = तुममें से (त्यम् उ नरम्) उसी मनुष्य को (गृणीषे) = स्तुत करता हूँ, आदर देता हूँ अर्थात् वही मेरे प्रेम का पात्र होता है जो १. (शवस: पतिम्) = बल का पति है, परन्तु (अप्रहणम्) = हिंसा करनेवाला नहीं है। शक्ति होते हुए हिंसा न करना यह सयनता का महान् लक्षण है। निर्बल की विवशतावाली अहिंसा शोभा नहीं पाती । सबल होते हुए अहिंसक होना शक्ति को रक्षा के लिए विनियुक्त करना ही नर बनना है। २. (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यवाला है परन्तु उसे धन का मद नहीं। वह अभिमान में आकर छोटी-छोटी बातों पर तैश में नहीं आ जाता। (विश्वासाहम्) = सब बातों को सहनेवाला है। यह सदा विनीत बना रहता है, क्षमा की वृत्तिवाला होता है। 'अभ्युदये क्षमा' – यही तो महात्माओं का स्वभाव होता है कि सम्पन्नता में भी विनीत व क्षमाशील बने रहते हैं। ३. ये (विश्ववेदसम्) = सर्वज्ञ होते हैं - विश्व - त्र= सबकुछ जाननेवाले होते हैं, परन्तु सर्वज्ञकल्प होते हुए भी ये कर्म को हेय नहीं समझते। (शचिष्ठम्) = अधिक-से-अधिक क्रियाशील होते हैं। ये क्रिया को अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल नहीं समझते। यही वस्तुत: सच्चा ज्ञानी है 'बार्हस्पत्य' है। इसी का जीवन शान्ति से युक्त होता है अर्थात् यह अपने जीवन को शान्ति से युक्त करता है। इसीसे यह ‘शंयु' कहलाता है।
Essence
हम शक्तिशाली हों, परन्तु शक्ति का विनियोग रक्षा में करें, सम्पन्न होकर भी विनीत बने रहें तथा सर्वज्ञकल्प होकर भी सतत् क्रियाशील हों।
 
Subject
नर कौन है ?