Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 354

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ र꣢थं꣣ य꣢थो꣣त꣡ये꣢ सु꣣म्ना꣡य꣢ वर्तयामसि । तु꣣विकूर्मि꣡मृ꣢ती꣣ष꣢ह꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ शविष्ठ꣣ स꣡त्प꣢तिम् ॥३५४॥

आ꣢ । त्वा꣣ । र꣡थ꣢꣯म् । य꣡था꣢꣯ । ऊ꣣त꣡ये꣢ । सु꣣म्ना꣡य꣢ । व꣣र्तयामसि । तुविकूर्मि꣢म् । तु꣣वि । कूर्मि꣢म् । ऋ꣣तीष꣡ह꣢म् । ऋ꣣ती । स꣡ह꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । श꣣विष्ठ । स꣡त्प꣢꣯तिम् । सत् । प꣣तिम् ॥३५४॥

Mantra without Swara
आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि । तुविकूर्मिमृतीषहमिन्द्रꣳ शविष्ठ सत्पतिम् ॥

आ । त्वा । रथम् । यथा । ऊतये । सुम्नाय । वर्तयामसि । तुविकूर्मिम् । तुवि । कूर्मिम् । ऋतीषहम् । ऋती । सहम् । इन्द्रम् । शविष्ठ । सत्पतिम् । सत् । पतिम् ॥३५४॥

Samveda - Mantra Number : 354
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि 'प्रियमेध' है, जिसे मेधा-ज्ञान प्रिय है। यह प्रियमेध कहता है कि हे प्रभो!(त्वा) = आपको (रथं वर्तयामसि) = अपनी जीवनयात्रा के रथ के रूप में वर्तते हैं। मैं अपनी जीवनयात्रा का आधार प्रकृति को न बनाकर प्रभु को बनाता हूँ। ऐसा मैं इसलिए करता हूँ कि

१. (यथोतये) = मैं अपनी यथायोग्य रक्षा कर पाता हूँ। प्रभुमूलक जीवन बनाने पर मेरा खान-पान न चले ऐसी बात कभी नहीं होती। प्रभुभक्तों का योगक्षेम तो प्रभु चलाते ही हैं। मनुष्य वासनाओं का शिकार बनने से भी बचा रहता है और परिणामत: २. (सुम्नाय) = सुख के लिए मैं प्रभु को अपना रथ बनाता हूँ। मेरी सब इन्द्रियाँ उत्तम बनी रहतीं हैं। उनमें असुरों के आक्रमण का कोई विकार नहीं आ जाता, वाणी अशुभ शब्द नहीं बोलने लगती, कान अशुभ नहीं सुनने लगते।

हम उस प्रभु को अपने जीवन का रथ बनाते हैं जो १. (तूविकह्रर्मिम) = महान् धारक कर्मोंवाले हैं। २. ऋतीषहम्-दुर्गति का पराभव करनेवाले हैं। ३. (इन्द्रम्) = शत्रुओं का द्रावण करनेवाले हैं। ४. (शविष्ठ) =  अत्यन्त शक्तिशाली हैं और ५. (सत्पतिम्) = सयनों के पालक हैं। ऐसे प्रभु को रथ बनाने का अभिप्राय स्पष्ट है कि हम स्वयं ऐसा बनने का प्रयत्न करते हैं। हमारे सब कर्म औरों का धारण करनेवाले होते हैं- हम दुर्गति को दूर करने का प्रयत्न करते हैं। अपने काम-क्रोधादि को दूर भगाने के लिए यत्नशील होते हैं, शक्तिशाली बनते हुए सयनों के रक्षक बनते हैं।

यहाँ मन्त्र में ‘सत्पतिम्' तथा 'ऋतीषहम्' शब्द विशेषतः ध्यान देने योग्य हैं। जहाँ सयनों की रक्षा का उल्लेख है, वहाँ दुर्जनों के नाश के स्थान पर 'दुर्गति' का उल्लेख है। हमने बुरे व्यक्ति को नहीं मार डालना उसकी बुराई को मारने व हटाने का प्रयत्न करना है।

इस प्रकार अपने जीवन को बिताकर ही हम यात्रा को पूर्ण कर सकते हैं। यही बुद्धिमत्ता

है, यही प्रियमेध बनना है। यह प्रियमेध' अलिप्त रहकर आंगिरस तो बनता ही है।
Essence
 हम अपनी जीवनयात्रा का रथ प्रभु को बनाएँ।
Subject
वह महान रथ