Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 352

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡त्य꣢स्मै꣣ पि꣡पी꣢षते꣣ वि꣡श्वा꣢नि वि꣣दु꣡षे꣢ भर । अ꣣रङ्गमा꣢य꣣ ज꣢ग्म꣣ये꣡ऽप꣢श्चादध्व꣣ने꣡ न꣢रः ॥३५२॥

प्र꣡ति꣢꣯ । अ꣣स्मै । पि꣡पी꣢꣯षते । वि꣡श्वा꣢꣯नि । वि꣣दु꣡षे꣢ । भर । अरङ्गमा꣡य꣢ । अ꣣रम् । गमा꣡य꣢ । ज꣡ग्म꣢꣯ये । अ꣡प꣢꣯श्चादध्वने । अ꣡प꣢꣯श्चा । द꣣ध्वने । न꣡रः꣢꣯ । ॥३५२॥

Mantra without Swara
प्रत्यस्मै पिपीषते विश्वानि विदुषे भर । अरङ्गमाय जग्मयेऽपश्चादध्वने नरः ॥

प्रति । अस्मै । पिपीषते । विश्वानि । विदुषे । भर । अरङ्गमाय । अरम् । गमाय । जग्मये । अपश्चादध्वने । अपश्चा । दध्वने । नरः । ॥३५२॥

Samveda - Mantra Number : 352
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अस्मै) = इस (प्रति) = प्रत्येक व्यक्ति के लिए (नरः) = [ना का द्वितीया बहुवचन] आगे ले चलने की भावनाओं को (भर) = पूर्ण कीजिए। किसके लिए=

१. (पिपीषते) = जो रयि और प्राणशक्ति की वृद्धि के लिए सोमपान करना चाहता है। इस सोमपान से उसमें रयि= चन्द्रमा व प्राण=आदित्य तत्त्वों का मेल होता है। यह व्यक्ति आदित्य के समान अन्धकार को दूर करता है, परन्तु चन्द्र की भाँति आह्लादमय बना रहता है।

२. (विश्वानि) = हमारे न चाहते हुए भी अन्दर प्रविष्ट हो जानेवाली काम, क्रोध व लोभ आदि भावनाओं को (विदुषे) अच्छी प्रकार समझनेवाले के लिए। लोकहित में लगे हुए व्यक्ति को इन भावनाओं को समझना ही चाहिए। हम शत्रु को समझेंगे ही नहीं तो उसे जीतेंगे कैसे?

३. (अरङ्गमाय) = [अरं = वारण] यह लोगों के दुःखों व अज्ञानों को दूर करने के लिए गतिशील होता है तथा अपने इस कार्य में
 
४. (जग्मये)= निरन्तर क्रियाशील बना रहता है। कार्य के गौरव व आयुष्य की सीमितता को समझता हुआ यह आलसी हो ही कैसे सकता है? 

५. (अपश्चादध्वने)= यह अपने जीवन में पीछे कदम नहीं रखता। जब लोकहित के मार्ग को अपनाता है तो काम, • क्रोध व लोभ से वह अपने मार्ग से विरत नहीं होता। लोगों के अपशब्द, लोगों के पत्थर व विषदान भी उसे अपने कार्य से उपरत नहीं कर पाते।

शरीर से अपने को शक्ति-[वाज] - सम्पन्न बनाता है, इन्द्रियों को क्रियाशील [वाज=क्रिया] मन को त्याग की भावना से युक्त [वाज - sacrifice] और बुद्धि को ज्ञान परिपूर्ण [ वाज- ज्ञान ] बनाता हुआ यह ‘भारद्वाज' निरन्तर लोकहित के मार्ग पर आगे और आगे बढ़ता है। यह ज्ञान पुञ्ज ‘बार्हस्पत्य' बनकर औरों के अज्ञान को भी दूर करता है।
Essence
हम ‘बार्हस्पत्य भारद्वाज' बनकर औरों को भी आगे ले चलनेवाले बनें। इस कार्य में सफलता के लिए हम अपने में चन्द्र व सूर्य- माधुर्य और प्रकाश - दोनों तत्त्वों का समन्वय करें।
Subject
पीछे कदम न रखनेवाला
Footnote
नोट – नेता की तो यही भावना होनी चाहिए कि न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं नापुनर्भवम् । कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्ति नाशनम् ॥