Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 350

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣢तो꣣ न्वि꣢न्द्र꣣ꣳ स्त꣡वा꣢म शु꣣द्ध꣢ꣳ शु꣣द्धे꣢न꣣ सा꣡म्ना꣢ । शु꣣द्धै꣢रु꣣क्थै꣡र्वा꣢वृ꣣ध्वा꣡ꣳस꣢ꣳ शु꣣द्धै꣢रा꣣शी꣡र्वा꣢न्ममत्तु ॥३५०॥

आ꣢ । इ꣣त । उ । नु꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स्त꣡वा꣢꣯म । शु꣣द्ध꣢म् । शु꣣द्धे꣡न꣢ । सा꣡म्ना꣢꣯ । शु꣣द्धैः꣢ । उ꣣क्थैः꣢ । वा꣣वृध्वाँ꣡स꣢म् । शु꣣द्धैः꣢ । आ꣣शी꣡र्वा꣢न् । आ꣣ । शी꣡र्वा꣢꣯न् । म꣣मत्तु ॥३५०॥

Mantra without Swara
एतो न्विन्द्रꣳ स्तवाम शुद्धꣳ शुद्धेन साम्ना । शुद्धैरुक्थैर्वावृध्वाꣳसꣳ शुद्धैराशीर्वान्ममत्तु ॥

आ । इत । उ । नु । इन्द्रम् । स्तवाम । शुद्धम् । शुद्धेन । साम्ना । शुद्धैः । उक्थैः । वावृध्वाँसम् । शुद्धैः । आशीर्वान् । आ । शीर्वान् । ममत्तु ॥३५०॥

Samveda - Mantra Number : 350
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सबके साथ स्नेह करनेवाले विश्वामित्र कहते हैं कि (एत उ) = निश्चय से चारों ओर से आओ ही। जहाँ कहीं भी होवो, इस प्रभु प्रार्थना के समय एक स्थान पर एकत्रित हो जाओ। (नु) = अब (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु का हम स्(तवाम) = स्तवन करें, जोकि (शुद्धम्) = पूर्ण शुद्ध हैं- किसी भी प्रकार की मलिनता का जिनसे सम्पर्क नहीं।

उस प्रभु का स्तवन का प्रकार क्या है ?

[ १ ] (शुद्धेन साम्ना) = शुद्ध शान्ति की मनोवृत्ति से। हमारे मनों में किसी के प्रति द्वेष की कोई भावना न हो। हमारे हृदय शुद्ध हों और शान्ति की मनोवृत्ति से परिपूर्ण हों। [२] (शुद्धैः उक्थैः) = शुद्ध वचनों से (वावृध्वांसम्) = बढ़नेवाले उस प्रभु का हम स्तवन करें। हमारे शुद्ध वचनों से प्रभु की महिमा बढ़ती है। ऋत और सत्य बोलकर ही तो हम अपने जीवनों से ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं। ब्रह्म वदिष्यामि, ऋतं वदिष्यामि, सत्यं वदिष्यामि ]। प्रभु सत्य हैं ओर हमारे छलशून्य सत्य वचनों से ही ब्रह्म का प्रतिपादन हो पाता है। [३] प्रभु के उपासक को चाहिए कि (शुद्धैः) = शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि इन सब उपकरणों को शुद्ध बनाकर (आशीर्वान्) = सबके लिए शुभ इच्छाओंवाला होता हुआ [with blessings for all] (ममत्तु) = सदा प्रसन्न मनवाला होकर विचरे । उसके चेहरे पर मानसप्रसाद की झलक हो ।

संक्षेप में, जो प्रभु का उपासक है- उसके गुणगान करनेवाले ‘गाथिन' हैं–१. उसका मन सबके प्रति शान्तिवाला होता है, २. उसके वचन छलशून्य ऋजु व सत्य होते हैं, और ३. उसके चेहरे पर प्रसाद की झलक होती है उ - उसका जीवन उल्लासमय होता है ।
Essence
निर्दोष मन, सत्यवाणी व प्रसन्नवदन ही प्रभुभक्त के लक्षण हैं।
Subject
क्या मैं प्रभुमुक्त हूँ?