Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 349

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- तिरश्चीराङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ गि꣡रो꣢ र꣣थी꣢रि꣣वा꣡स्थुः꣢ सु꣣ते꣡षु꣢ गिर्वणः । अ꣣भि꣢ त्वा꣣ स꣡म꣢नूषत꣣ गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥३४९॥

आ꣢ । त्वा꣣ । गि꣡रः꣢꣯ । र꣣थीः꣢ । इव । अ꣡स्थुः꣢꣯ । सु꣣ते꣡षु꣢ । गि꣣र्वणः । गिः । वनः । अभि꣢ । त्वा꣣ । स꣢म् । अ꣣नूषत । गा꣡वः꣢꣯ । व꣣त्स꣢म् । न । धे꣣न꣡वः꣢ ॥३४९॥

Mantra without Swara
आ त्वा गिरो रथीरिवास्थुः सुतेषु गिर्वणः । अभि त्वा समनूषत गावो वत्सं न धेनवः ॥

आ । त्वा । गिरः । रथीः । इव । अस्थुः । सुतेषु । गिर्वणः । गिः । वनः । अभि । त्वा । सम् । अनूषत । गावः । वत्सम् । न । धेनवः ॥३४९॥

Samveda - Mantra Number : 349
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
अपने अन्दर गति करनेवाला ऋषि तिरश्ची है। यह अन्तः स्थित प्रभु का दर्शन करता है। प्रभु इससे कहते हैं कि हे (गिर्वणः) = वेदवाणियों का सेवन करनेवाले तिरश्ची! (त्वा) = तुझे (गिरः) = ये वेदवाणियाँ (सुतेषु) = उस उस उत्पन्न धर्म-संकट के समय (रथी: इव) = सारथियों की भाँति, मार्गदर्शकों की तरह (आ अस्थुः) = समन्तात् प्राप्त हों। वे तेरी जीवनयात्रा में तेरे चारों ओर तेरी समस्याओं को हल करनेवाली हों | (गाव:) = ये वेदवाणियाँ [गमयन्ति अर्थान्] (त्वा) = तुझे (अभि) = दोनों ओर– अन्दर व बाहर पाठमात्रस्वरूप में और विशदार्थरूप में (सम्) = अच्छी प्रकार (अनूषत) = प्राप्त हों [नु= to praise ] । उसी प्रकार प्रशंसित बना दें (न) = जैसेकि (धेनवः) = नवसूतिका गौवें (वत्सम्) = बछड़े को । नवसूतिका गौवें चाट - चूटकर बछड़े की बाह्य त्वचा को शुद्ध कर डालती हैं और पौष्टिक दूध पिलाकर उसे पुष्ट बनातीं हैं। इसी प्रकार ये वेदवाणियाँ पाठमात्र से उच्चारण की जाकर भी हमें असद् व्यसनों से बचाकर आध्यात्मिक दृष्टि से नीरोग बनाती हैं और अर्थज्ञान हो जाने पर तो हमारे मस्तिष्क व मन पर एक विशेष प्रभाव डालती हुई हमारे जीवनों को ऊँचा बनाती है।

जब कभी हमारे सामने कोई धर्मसंकट उपस्थित होता है तो उस समय ये वेदवाणियाँ हमें उस उलझन से निकलने में सहायता होती हैं। 'धर्म क्या है?' इस प्रश्न का उत्तर यही है कि 'जिसकी वेद प्रेरणा दे रहा है । ' धर्म संकट की स्थिति सबके जीवनों में उपस्थित होती है। यदि हम नियमित रूप से वेदवाणियों का सेवन करते हैं तो ये वाणियाँ हमारी पथप्रदर्शक बनती हैं। उनके अनुसार मार्ग का आक्रमण करके हम भोगमार्ग से बचे रहते हैं-परिणामतः रोगों से भी बचे रहते हैं- हमारी इन्द्रिय शक्तियाँ जीर्ण नहीं होतीं और हम 'आङ्गिरस' बने रहते हैं।
Essence
 धर्म-ज्ञान के लिए हम प्रभुवाणी को परम प्रमाण माननेवाले हों। 
Subject
[धर्मंजिज्ञासमानानां ] प्रमाणं परमं श्रुतिः