Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 345

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡दि꣢न्द्र चित्र म इ꣣ह꣢꣫ नास्ति꣣ त्वा꣡दा꣢तमद्रिवः । रा꣡ध꣣स्त꣡न्नो꣢ विदद्वस उभयाह꣣स्त्या꣡ भ꣢र ॥३४५॥

य꣢त् । इ꣣न्द्र । चित्र । मे । इह꣢ । न । अ꣡स्ति꣢ । त्वा꣡दा꣢꣯तम् । त्वा । दा꣣तम् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । रा꣡धः꣢꣯ । तत् । नः꣣ । विदद्वसो । विदत् । वसो । उभयाहस्ति꣢ । आ । भ꣣र ॥३४५॥

Mantra without Swara
यदिन्द्र चित्र म इह नास्ति त्वादातमद्रिवः । राधस्तन्नो विदद्वस उभयाहस्त्या भर ॥

यत् । इन्द्र । चित्र । मे । इह । न । अस्ति । त्वादातम् । त्वा । दातम् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । राधः । तत् । नः । विदद्वसो । विदत् । वसो । उभयाहस्ति । आ । भर ॥३४५॥

Samveda - Mantra Number : 345
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) = सब शक्तियों के स्वामिन् ! (चित्र) = [चित+र] सब ज्ञानोंवाले व ज्ञानों के देनेवाले प्रभो! (यत्) = जो (राधः) = धन (इह) = यहाँ इस जीवन में (मे) = मेरा (न अस्ति) = नहीं है और जो धन हे (अद्रिवः) = न विदारण के योग्य [अ+दृ] तथा आदरणीय [आदृ] प्रभो ! (त्वा आदातम्) = आपसे सर्वथा ग्रहण किया गया है (तत् राध:) - उस सिद्धि [राध् - सिद्धि] देनेवाले धन को (नः) हमें हे (विदद्वसो) = वसुओं के प्राप्त करानेवाले ! (उभया हस्त्या) = दोनों हाथों से (आभर) = दीजिए। इस मन्त्र में प्रभु को ‘इन्द्र व चित्र' शब्दों से स्मरण करके यह संकेत हुआ है कि यह

प्रभु शक्ति के पुञ्ज हैं व ज्ञान के समुद्र हैं। जीव ने गलती से भोग मार्ग को [Enjoyment] अपना कर शक्ति को तो क्षीण कर ही लिया, ज्ञान से भी शून्य हो गया, कामना ने उसके ज्ञान पर भी परदा डाल दिया। चाहिए था कि वह योगमार्ग पर चलकर प्रभु से अपना मेल बनाता। चला वह भोग के मार्ग पर और परिणामतः प्रभु से दूर हो गया। जीव अभ्युदय साधन में ही उलझा रहा, निःश्रेयस का उसे स्मरण ही न रहा। प्रेय मार्ग को उसने पसन्द किया-श्रेय उसे रुचिकर न हुआ। प्रकृति उसे आकृष्ट किया - प्रभु को वह उसकी चकाचौंध में देख नहीं पाया। शरीर को ही उसने ‘मैं' समझा, अपना वास्तविक स्वरूप उससे ओझल ही रहा । धन ही उसके लिए सब कुछ हो गया, धनाध्यक्ष का उसे ध्यान ही न आया । स्थूल आनन्दों में उलझा हुआ वह सूक्ष्म आनन्दों को भूल गया। शरीर के लिए खाना तो आवश्यक था, परन्तु उसका शरीर नहीं अपितु मन खाने में लग गया।

अब वह प्रभु से प्रर्थना करता है कि मुझे वह धन दीजिए जोकि मेरे पास नहीं है। प्रभु ने भोगों को स्वीकार नहीं किया। इसीसे प्रभु ज्ञान व शक्ति के पुञ्ज बने रहे और इसी का परिणाम था कि वह 'न - विदारण के योग्य [शक्ति] तथा आदरणीय [ज्ञान] बने हैं'।

उस प्रभु ने ही हमें भी इन दोनों वसुओं को प्राप्त कराना है। ये ही राधः हैं – सिद्धि के देनेवाले हैं। प्रभु एक हाथ से मुझे ज्ञान दें तो दूसरे से शक्ति, इन दोनों को अलग-अलग करके मैं अपना कल्याण सिद्ध नहीं कर सकता। इनके समन्वय में ही मेरे सारे कष्टों की समाप्ति है, मैं ज्ञान और शक्ति का पुञ्ज बनकर त्रिविध तापों से ऊपर उठ्गा, ‘अ-त्रि' हूँगा। मैं उस दिन अपनी इस मातृभूमि का सच्चा पुत्र हूंगा - ‘भौम' बनूँगा।
Essence
मैं भी उस ज्ञान व शक्ति का स्वीकारनेवाला बनूँ जिन्हें प्रभु ने स्वीकार किया है।
Subject
वह धन जो मेरे पास नहीं?