Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 343

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- जेता माधुच्छन्दसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रं꣣ वि꣡श्वा꣢ अवीवृधन्त्समु꣣द्र꣡व्य꣢चसं꣣ गि꣡रः꣢ । र꣣थी꣡त꣢मꣳ र꣣थी꣢नां꣣ वा꣡जा꣢ना꣣ꣳ स꣡त्प꣢तिं꣣ प꣡ति꣢म् ॥३४३॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वि꣡श्वाः꣢ । अ꣣वीवृधन् । समुद्र꣡व्य꣢चसम् । स꣣मुद्र꣢ । व्य꣣चसम् । गि꣡रः꣢꣯ । र꣣थी꣡त꣢मम् । र꣣थी꣡नाम् । वा꣡जा꣢꣯नाम् । स꣡त्प꣢꣯तिम् । सत् । प꣣तिम् । प꣡ति꣢꣯म् ॥३४३॥

Mantra without Swara
इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः । रथीतमꣳ रथीनां वाजानाꣳ सत्पतिं पतिम् ॥

इन्द्रम् । विश्वाः । अवीवृधन् । समुद्रव्यचसम् । समुद्र । व्यचसम् । गिरः । रथीतमम् । रथीनाम् । वाजानाम् । सत्पतिम् । सत् । पतिम् । पतिम् ॥३४३॥

Samveda - Mantra Number : 343
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(विश्वाः गिरः) = सब वाणियाँ चाहें वे ऋग्रूप, यजुरूप या सामरूप हैं (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को (अवीवृधन्) = बढ़ाती हैं। सभी उसकी महिमा का वर्णन करती हैं, परन्तु क्या वेदवाणियाँ उस प्रभु का पूर्ण वर्णन कर डालती हैं? नहीं। वे प्रभु तो 'अनाद्यनन्तं' अनादि व अनन्त हैं। वे तो समुद्र (व्यचसम्) = समुद्र के समान विस्तारवाले हैं। जैसे समुद्र मध्यस्थ पुरुष को समुद्र का ओर व छोर दिखाई नहीं देता इसी प्रकार प्रभु के गुणधर्मों का अन्त नहीं है। वे किस रूप में इस ब्रह्माण्ड का निर्माण, धारण व प्रलय करते हैं? कितने दिन में करते हैं? इत्यादि बातें हमारे लिए अज्ञेय हैं- उनका जानना अत्यावश्यक भी नहीं है । किस प्रकार कौन से कर्म का क्या फल मिल रहा है? यह जानना गहन व अनावश्यक है। इतना ही जानना पर्याप्त है कि वे प्रभु (रथीतमं रथीनाम्) = रथी जो जीव हैं उनके वे रथीतम हैं—सर्वोत्तम सारथि हैं। यदि हम अपने इस रथ की बागडोर प्रभु हाथों में सौंप देंगे तो इसके कहीं टकराने का व नष्ट-भ्रष्ट होने का खतरा न होगा। २. वे प्रभु (वाजानां पतिम्) = गति [वज् गतौ], शक्ति [वाज- Strength], त्याग [वाज=Sacrifice], व ज्ञान [वज्-गति-ज्ञान] के पति हैं। मैं प्रभु से सम्पर्क बनाता हूँ तो वे प्रभु मेरे अन्नमयकोश को गतिमय बनाए रखते हैं, मेरी सब इन्द्रियाँ शक्तिशाली बनी रहती हैं, मेरा मानस त्याग की भावना से पूर्ण होता है और मेरी बुद्धि ज्ञान से दीप्त हो उठती है। और फिर प्रभु ३. (सप्ततिम्) = सयनों के पति हैं। में सयन बनूँ तो प्रभु की रक्षा का पात्र बनूँगा ही।

संसार में अज्ञेय = Unknowable बहुत हैं, ज्ञेय = Knowable बहुत कम। हम इस रहस्यमय संसार को थोड़ा ही जान सकते हैं - प्रभु को तो बहुत ही थोड़ा । परन्तु उल्लिखित तीन बातें जान लेना ही बड़ा पर्याप्त है। हमारे चरित्रों के निर्माण में इन बातों का ही सर्वप्रधान स्थान है, हम प्रभु को इस रूप में समझते हुए अपने अपने रथ ही बागडोर प्रभु को ही सौंप दें, तो क्या हम संसार में विजयी न होंगे? अवश्य होंगे। इस विजय के कारण ही इस मन्त्र का ऋषि ‘जेता' कहलाया है। यह माधुच्छन्दस है - अत्यन्त मधुर इच्छाओंवाला है- ऐसा हो भी क्यों न? इसकी तो सब इच्छाएँ प्रभु प्रेरणा से प्रेरित हो रहीं हैं।
Essence
हम प्रभुरूप सारथिवाले हों, सयन बनकर प्रभु की रक्षा के पात्र हों।
Subject
इतना ही जानना पर्याप्त है