Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 334

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विमद ऐन्द्रः, वसुकृद्वा वासुक्रः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡जा꣢मह꣣ इ꣢न्द्रं꣣ व꣡ज्र꣢दक्षिण꣣ꣳ ह꣡री꣢णाꣳ र꣣थ्यां꣢३꣱वि꣡व्र꣢तानाम् । प्र꣡ श्मश्रु꣢꣯भि꣣र्दो꣡धु꣢वदू꣣र्ध्व꣡धा꣢ भुव꣣द्वि꣡ सेना꣢꣯भि꣣र्भ꣡य꣢मानो꣣ वि꣡ राध꣢꣯सा ॥३३४॥

य꣡जा꣢꣯महे । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । व꣡ज्र꣢꣯दक्षिणम् । व꣡ज्र꣢꣯ । द꣣क्षिणम् । ह꣡री꣢꣯णाम् । र꣣थ्या꣢꣯म् । वि꣡व्र꣢꣯तानाम् । वि । व्र꣣तानाम् । प्र꣢ । श्म꣡श्रु꣢꣯भिः । दो꣡धु꣢꣯वत् । ऊ꣣र्ध्व꣡धा꣢ । भु꣣वत् । वि꣢ । से꣡ना꣢꣯भिः । भ꣡य꣢꣯मानः । वि । रा꣡ध꣢꣯सा ॥३३४॥

Mantra without Swara
यजामह इन्द्रं वज्रदक्षिणꣳ हरीणाꣳ रथ्यां३विव्रतानाम् । प्र श्मश्रुभिर्दोधुवदूर्ध्वधा भुवद्वि सेनाभिर्भयमानो वि राधसा ॥

यजामहे । इन्द्रम् । वज्रदक्षिणम् । वज्र । दक्षिणम् । हरीणाम् । रथ्याम् । विव्रतानाम् । वि । व्रतानाम् । प्र । श्मश्रुभिः । दोधुवत् । ऊर्ध्वधा । भुवत् । वि । सेनाभिः । भयमानः । वि । राधसा ॥३३४॥

Samveda - Mantra Number : 334
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इन्द्रियमनोयुक्त होर जीव भोक्ता होता है, परन्तु जिस दिन यह इनसे अपने पार्थक्य को समझ लेता है उस दिन इनमें न उलझा रहने के कारण यह जीवनमुक्त हो जाता है। यह लोकहित के लिए मानवमात्र का पथप्रदर्शन करता है और हम सब (यजामहे) = इसका आदर करते हैं। किसका?

१. (इन्द्रम्) = जो इन्द्रियों का अधिष्ठाता है, २. (वज्रदक्षिणम्) = [वज् गतौ, दक्षिण=Dexeterous] प्रत्येक कार्य को कुशलता से करता है। ('योगः कर्मसुकौशलम्') = यह बात जिसके जीवन-व्यवहार में स्पष्ट दीखती है, ३. जो (विव्रतानाम्) = विविध व्रतोंवाले (हरीणां) = इन्द्रियरूप घोड़ों का (रथ्यम्) = उत्तम नियन्ता है। आँख-कान इत्यादि इन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न कार्यों में व्याप्त हैं, इन सबको जो सुन्दरता से संयत करता है, ४. (श्मश्रुभिः) = [श्मनि श्रितं] शरीर में आश्रित प्राण-मन व बुद्धि से जो (प्रदोधुवत्) = वासनाओं को कम्पित कर दूर भगा देता है, ५. (उर्ध्वधा भुवत्) = अपने को सदा विषयों से ऊपर रखनेवाला होता है; और अन्त में ६. (राधसा) = योगसिद्धियों के द्वारा [राध=सिद्धि] तथा (सेनाभि:) =[स, इन = प्रभु] प्रभुसहित विचारधाराओं के द्वारा (वि) = विशेषरूप से (भयमान:) = शत्रुसेनाओं को डरानेवाला होता है। योगसिद्धि व सदा प्रभुस्मरण अशुभ विचारों को दूर भगानेवाले हैं। ‘योगसिद्ध' अभयास है; विचार 'वैराग्य' को र्पदा करनेवाला है। अभ्यास और वैराग्य के होने पर मन विषय-वासनाओं में थोड़े ही फँसता है ? यह व्यक्ति मद व अहंकार से सर्वथा दूर होने के कारण 'विमद' है। इन्द्र=परमात्मा का, न कि प्रकृति का होने से 'ऐन्द्र' है। इसने अपने अन्दर उत्तमोत्तम भावनाओं को जन्म देकर ‘वसुओं' का निर्माण किया है अतः यह 'वसुकृत्' है। प्राकृतिक भोगों को छोड़कर इसने दिव्य योगसिद्धियों को उत्तम विचारशक्तियों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया है अतः यह 'वासुक्र' है- उत्तम विनिमयवाला ।
Essence
हम भी यथासम्भव जीवनमुक्त बनने का प्रयत्न करें।
Subject
हम किसे आदर देते हैं?