Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 330

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣢दु꣣ ब्र꣡ह्मा꣢ण्यैरत श्रव꣣स्ये꣡न्द्र꣢ꣳ सम꣣र्ये꣡ म꣢हया वसिष्ठ । आ꣡ यो विश्वा꣢꣯नि꣣ श्र꣡व꣢सा त꣣ता꣡नो꣢पश्रो꣣ता꣢ म꣣ ई꣡व꣢तो꣣ व꣡चा꣢ꣳसि ॥३३०॥

उ꣢त् । उ꣣ । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । ऐ꣣रत । श्रवस्य꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स꣣मर्ये꣢ । स꣣ । मर्ये꣢ । म꣣हय । वसिष्ठ । आ꣢ । यः । वि꣡श्वा꣢꣯नि । श्र꣡व꣢꣯सा । त꣣ता꣡न꣢ । उ꣣पश्रोता꣢ । उ꣣प । श्रोता꣢ । मे꣣ । ई꣡व꣢꣯तः । व꣡चां꣢꣯ऽसि ॥३३०॥

Mantra without Swara
उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्येन्द्रꣳ समर्ये महया वसिष्ठ । आ यो विश्वानि श्रवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचाꣳसि ॥

उत् । उ । ब्रह्माणि । ऐरत । श्रवस्य । इन्द्रम् । समर्ये । स । मर्ये । महय । वसिष्ठ । आ । यः । विश्वानि । श्रवसा । ततान । उपश्रोता । उप । श्रोता । मे । ईवतः । वचांऽसि ॥३३०॥

Samveda - Mantra Number : 330
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
श्रवस्' शब्द के ज्ञान, यश व श्री तीनों ही अर्थ हैं, 'य' प्रत्यय इच्छा अर्थ में आता है। (श्रवस्या) = ज्ञान, यश व श्री की इच्छा से (ब्रह्माणि) = वेदमन्त्रों को (उ) = निश्चय से (उद्ऐरत) = उच्चारण करो ही। वेदमन्त्रों का अभ्यास यहाँ स्वाध्याय का द्योतक है। स्वाध्याय के बिना ज्ञानादि की प्राप्ति सम्भव नहीं।

हे (वसिष्ठ) = सर्वोत्तम निवास चाहनेवाले अथवा वशियों में सर्वश्रेष्ठ! तू (सम् अर्ये) = उत्तम जितेन्द्रिय बनने के निमित्त (इन्द्रम्) = उस परमैयशाली प्रभु को (महया) = पूज। उस प्रभु का गुणगान तुझे वासनाओं के आक्रमण से सुरक्षित रक्खेगा। ‘समर्ये का दूसरा अर्थ ‘स-मर्ये' [सह मर्याः यत्र] जहाँ घर के सब व्यक्ति समवेत हों वहाँ प्रभु की पूजा कर अर्थात् प्रातः- सायं मिलकर प्रभु - उपासना कर ।

(यः) = जो प्रभु (श्रवसा) = अपनी सर्वज्ञता से व श्री से (विश्वानि) = इन सब लोक-लोकान्तरों को (आततान) = विस्तृत करता है, वह प्रभु (ईवतः) = [ई-गमन] गमनशील (मे) = मेरे (वचांसि) = वचनों को (उपश्रोता) = समीप से श्रवण करता है। यदि मैं स्वयं पुरुषार्थ नहीं करता, केवल प्रार्थना ही प्रार्थना करता हूँ तो मेरे वचन व्यर्थ हैं, वे प्रभु से सुने नहीं जाते। प्रभु का साहाय्य तो मुझे तभी प्राप्त होता है जबकि मैं स्वयं क्रियाशील बनता हूँ।

इस प्रकार एक आदर्श जीवन 'ज्ञान, उपासना व कर्म' तीनों को ही उचित स्थान प्राप्त होता है। ज्ञान और कर्म के मध्य में यहाँ उपासना को इसलिए रक्खा गया है कि ज्ञानपूर्वक कर्मों से ही वह साध्य होती है। उपसना से ज्ञान उज्ज्वल होता है तो कर्म पवित्र होते हैं। केवल ज्ञानी ज्ञानदैत्य बन जाता है, केवल भक्त अन्धभक्त [fanatic] हो जाता है और केवल कर्म मनुष्य को अनन्त रीतियों [ rituals] के जंजाल में फंसा देता है। इन तीनों के समन्वय से उसका जीवन अत्युत्तम बनता है और इस उत्तम निवासवाला यह ‘वसिष्ठ' होता है। इस ज्ञान उपासना व कर्म की त्रयी को अपने में घटित करने के लिए ही यह 'मैत्रावरुणि' प्राणापान की साधना करनेवाला बनता है।
Essence
प्रभुकृपा से प्राणसाधना करते हुए हम इस ज्ञान, कर्म व उपासना की त्रयी से अपने जीवनों को अलंकृत करें।
 
Subject
ज्ञान, उपासना व कर्मवाला जीवन