Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 326

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- द्युतानो मारुतः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣢ꣳ ह꣣ त्य꣢त्स꣣प्त꣢भ्यो꣣ जा꣡य꣢मानोऽश꣣त्रु꣡भ्यो꣢ अभवः꣣ श꣡त्रु꣢रिन्द्र । गू꣣ढे꣡ द्यावा꣢꣯पृथि꣣वी꣡ अन्व꣢꣯विन्दो विभु꣣म꣢द्भ्यो꣣ भु꣡व꣢नेभ्यो꣣ र꣡णं꣢ धाः ॥३२६॥

त्व꣢म् । ह꣣ । त्य꣢त् । स꣣प्त꣡भ्यः꣢ । जा꣡य꣢꣯मानः । अशत्रु꣡भ्यः꣢ । अ꣣ । शत्रु꣡भ्यः꣢ । अ꣣भवः । श꣡त्रुः꣢꣯ । इ꣣न्द्र । गूढे꣡इति꣢ । द्या꣡वा꣢꣯ । पृ꣣थिवी꣡इति꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । अविन्दः । विभुम꣡द्भ्यः꣢ । वि꣣ । भुम꣡द्भ्यः꣢ । भु꣡व꣢꣯नेभ्यः । र꣡ण꣢꣯म् । धाः꣣ ॥३२६॥

Mantra without Swara
त्वꣳ ह त्यत्सप्तभ्यो जायमानोऽशत्रुभ्यो अभवः शत्रुरिन्द्र । गूढे द्यावापृथिवी अन्वविन्दो विभुमद्भ्यो भुवनेभ्यो रणं धाः ॥

त्वम् । ह । त्यत् । सप्तभ्यः । जायमानः । अशत्रुभ्यः । अ । शत्रुभ्यः । अभवः । शत्रुः । इन्द्र । गूढेइति । द्यावा । पृथिवीइति । अनु । अविन्दः । विभुमद्भ्यः । वि । भुमद्भ्यः । भुवनेभ्यः । रणम् । धाः ॥३२६॥

Samveda - Mantra Number : 326
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जिस समय मनुष्य अभ्यास और वैराग्य को अपने जीवन में स्थान देता है, उस समय प्रभु कहते हैं कि (त्वम्) = तू (ह) = निश्चय से (त्यत्) = उन प्रसिद्ध (सप्तभ्यः )= योग की सात भूमिकाओं से (जायमानः) = अपना प्रादुर्भाव करते हुए हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विदारण करनेवाले जीव! (अशत्रुभ्यः) = उन कामादि का, जिनका कि कोई भी नाश करनेवाला नहीं हुआ [न शातयिता येषां] (शत्रुः अभवः)=शातयिता हुआ हैं तूने योगमार्ग पर आगे-आगे बढ़तेक हुए कामादि का विध्वंस कर डाला है। योगमार्ग में अगली - अगली भूमिका में पहुँचने में तेरा अधिक और अधिक विकास हुआ है। सात भूमिकाओं को पार कर 'समाधि' में स्थित होने पर तू रजोगुण को पूर्णरूप से जीत चुका है। अब संसार के ये राग तुझे अनुरक्त नहीं कर पाते। वेद के शब्दों में (गूढ़े) = सुसंवृत - सुरक्षित (द्यावापृथिवी) = [मूर्ध्ना द्यौः, पद्भ्यां भूमिः] मस्तिष्क से पावों तक सब अङ्गो को (अन्वविन्द:) = तूने अपने को प्राप्त कराया है। तेरे शरीर पर रोगों का आक्रमण नहीं, मन पर राग- द्वेष-मोहादि का व मस्तिष्क में कुविचारों का उत्थान नहीं । तूने सिर से पावों [from tip to toe] और इस प्रकार अपने जीवन को सफल बनाया है। यह (भुवनेभ्यः) उन लोकों के लिए जोकि (विभुमद्भ्यः) = उस सर्वव्यापक प्रभु के लोक हैं, अर्थात ब्रह्मलोक के लिए (रणम्) = आनन्दपूर्वक [delightfully] (धा:) = अपने को स्थापित करता है, ('सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयन्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा')। ये विगत रजोगुणवाले उस अमृत अव्ययात्मा पुरुष के लोक में पहुँचा ही करते हैं।

मन्त्र का ऋषि ‘द्युतान मारुत' ही है, जिसने कि प्राणों की साधना की है और अपने में दिव्यता को विस्तृत करने का प्रयत्न किया है।
Essence
हम अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मनोनिरोध करते हुए अपने को पवित्र बनाएँ और ब्रह्मलोक के लिए स्थानवाले बनें।
Subject
ब्रह्मलोक के लिए