Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 32

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
क꣣वि꣢म꣣ग्नि꣡मुप꣢꣯ स्तुहि स꣣त्य꣡ध꣢र्माणमध्व꣣रे꣢ । दे꣣व꣡म꣢मीव꣣चा꣡त꣢नम् ॥३२॥

क꣣वि꣢म् । अ꣣ग्नि꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । स्तु꣣हि । स꣣त्य꣡ध꣢र्माणम् । स꣣त्य꣢ । ध꣣र्माणम् । अध्वरे꣢ । दे꣣व꣢म् । अ꣣मीवचा꣡त꣢नम् । अ꣣मीव । चा꣡त꣢꣯नम् ॥३२॥

Mantra without Swara
कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे । देवममीवचातनम् ॥

कविम् । अग्निम् । उप । स्तुहि । सत्यधर्माणम् । सत्य । धर्माणम् । अध्वरे । देवम् । अमीवचातनम् । अमीव । चातनम् ॥३२॥

Samveda - Mantra Number : 32
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे जीव! (अ-ध्वरे)= इस हिंसारहित जीवन-यज्ञ में (अग्निम्)= उस आगे ले-चलनेवाले प्रभु की (उपस्तुहि)= समीप से स्तुति कर । जीवन में हमसे किसी की हिंसा न हो। हम यथासम्भव औरों का कल्याण ही करें। इस स्थिति में हमारे लिए वे प्रभु अवश्य अग्नि-आगे ले-चलनेवाले होंगे। वस्तुतः अहिंसा का मार्ग ही उन्नति का मार्ग है।

इस जीवन में हम उस प्रभु की समीप से स्तुति करें। उसे सदा समीप समझते हुए उत्तम गुणों में प्रीतिवाले बनें। ये उत्तम गुण इस मन्त्र के चार शब्दों से सूचित हो रहे हैं[क] (अमीवचातनम्) = नीरोगता, [ख] (देवम्) = दीपन, प्रकाश, [ग] (सत्यधर्माणम्) = सत्य का धारण, [घ] (कविम् )= क्रान्तदर्शी होना
अन्नमयकोश के दृष्टिकोण से प्रभु को हम अमीवचातनम् के रूप में स्मरण करें। वे रोगों का नाश करनेवाले हैं [अमीव-रोग, चातन=नाशक] । प्रभु - स्मरण से मानव-जीवन भोगप्रधान नहीं बनता परिणामतः रोग भी नहीं होते।

प्राणमयकोश के दृष्टिकोण से वे प्रभु 'देव' हैं [देवो द्योतनात्] सब प्राणों - इन्द्रियों को [प्राणा: वाव इन्द्रियाणि] वे द्योतित करनेवाले हैं। ज्ञान की साधनभूत ये इन्द्रियाँ ज्योतिर्मय हैं। इन्हें यह ज्योति प्रभु ने ही प्राप्त कराई है। प्रभु का स्मरण करनेवाले की इन्द्रिय-शक्तियाँ क्षीण नहीं होती।

मनोमयकोश के विचार से वे प्रभु सत्यधर्मा हैं। सत्य के द्वारा प्रभु ने मन की पवित्रता की व्यवस्था की है। सत्य मन को राग-द्वेषादि मलों से दूर रखता है। एक स्तोता को सत्य के द्वारा मन का नैर्मल्य सम्पादन करना है।

विज्ञानमयकोश के दृष्टिकोण से मन्त्र में प्रभु को कवि कहा गया है। वे क्रान्तदर्शी हैं। स्तोता को भी क्रान्तदर्शी बनना है। इस मार्ग पर चलना ही बुद्धिमत्ता है। प्रभुकृपा होगी तो हम भी बुद्धिमान् बनेंगे और इस मन्त्र के ऋषि ‘मेधातिथि' होंगे। 
Essence
प्रभु रोगों से दूर, ज्योतिर्मय, सत्यस्वरूप व ज्ञान - धन हैं। स्तोता को भी ऐसा ही बनना है। स्तुति का तो लाभ ही उस प्रभु के गुणों में प्रीति है।
Subject
चार रूपों का स्मरण