Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 315

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गातुरात्रेयः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡द꣢र्द꣣रु꣢त्स꣣म꣡सृ꣢जो꣣ वि꣢꣫ खानि꣣ त्व꣡म꣢र्ण꣣वा꣡न्ब꣢द्बधा꣣ना꣡ꣳ अ꣢रम्णाः । म꣣हा꣡न्त꣢मिन्द्र꣣ प꣡र्व꣢तं꣣ वि꣢꣫ यद्वः सृ꣣ज꣢꣫द्धा꣣रा अ꣢व꣣ य꣡द्दा꣢न꣣वा꣢न्हन् ॥३१५॥

अ꣡द꣢꣯र्दः । उ꣡त्स꣢꣯म् । उत् । स꣣म् । अ꣡सृ꣢꣯जः । वि । खा꣡नि꣢꣯ । त्वम् । अ꣣र्णवा꣢न् । ब꣣द्बधा꣣नान् । अ꣢रम्णाः । महा꣡न्त꣢म् । इ꣣न्द्र प꣡र्व꣢꣯तम् । वि । यत् । व꣡रिति꣢ । सृ꣣ज꣢त् । धा꣡राः꣢꣯ । अ꣡व꣢꣯ । यत् । दा꣣नवा꣢न् । ह꣣न् ॥३१५॥

Mantra without Swara
अदर्दरुत्समसृजो वि खानि त्वमर्णवान्बद्बधानाꣳ अरम्णाः । महान्तमिन्द्र पर्वतं वि यद्वः सृजद्धारा अव यद्दानवान्हन् ॥

अदर्दः । उत्सम् । उत् । सम् । असृजः । वि । खानि । त्वम् । अर्णवान् । बद्बधानान् । अरम्णाः । महान्तम् । इन्द्र पर्वतम् । वि । यत् । वरिति । सृजत् । धाराः । अव । यत् । दानवान् । हन् ॥३१५॥

Samveda - Mantra Number : 315
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(प्रथम) – गत मन्त्र में स्तुति का अन्तिम लाभ यह कहा गया था कि 'शक्ति के द्वारा जीवन में उल्लास।' उस शक्ति का रहस्य इस मन्त्र में वर्णित हुआ है। मनुष्य की इन्द्रियाँ विषयों में गईं, और उनकी शक्ति जीर्ण हुई। हे प्रभो! आप (उत्सम्) = प्रस्त्रवण को, इन्द्रियों को विषयों की ओर जाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को (अदर्द:) = विदीर्ण कर देते हो [दृ-जव जमंत] प्रभु स्मर-हर हैं, इन विषयों की उत्कण्ठा का हरण करनेवाले हैं। विषयोत्कण्ठा का समाप्त करके (खानि) = इन्द्रियों को (वि असृजः) = आप विषयों से मुक्त करते हो। ये विषय मनुष्य के लिए अतिग्रह नहीं रह जाते । इस प्रकार (त्वम्) = हे प्रभो! आप (बद्वधानाम्) = मुझे बुरी तरह से बाँधनेवाले (अर्णवान्) = विषय - समुद्रों को ['कामो हि समुद्र: ' उ] (अरम्णाः) = थाम देते हो। इस प्रकार विषयोत्कण्ठा की निवृत्ति, इन्द्रियों की विषयों से मुक्ति, अत्यन्त पीड़ित करते विषय समुद्र का रुक जाना, यह उपासना का प्रथम लाभ है, इसी का परिणाम शक्ति का न नष्ट होना है और जीवन का उल्लासमय बनना है।

(द्वितीय)- इस उपासना का दूसरा परिणाम यह है (यत्) = कि (इन्द्र) = हे इस अज्ञान राशि को विदीर्ण करनेवाले प्रभो! आप (महान्तं पर्वतम्) = महान् ग्रन्थियों-[पर्वों] - वाली अविद्या को (विवः) = विवृत कर देते हो-खोल डालते हो, उलझनों को सुलझा देते हो । संशयों की सब गांठें खुल जाती हैं और इस प्रकार (धारा) = ज्ञान - धाराओं को (विसृजत्) = आप प्रवाहित करते हो। पर्वत के विदीर्ण होने से जलप्रवाह बह उठता है, उसी प्रकार संशय पर्वत की विदीर्णता से ज्ञान की जलधारा बह उठती है। (ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा) = उपासना की पराकाष्ठा में सत्यपोषक बुद्धि तो प्राप्त होती ही है और (यत्) = वह ज्ञान (दानवान) = दानव-वृत्तियों को (अवहत्) = दूर नष्ट कर देता है। उपासना से ज्ञानाग्नि भी अशुभ वृत्तियों को भस्म कर देती है और हमें शक्तिशाली बनाती है।

उपासना के इन दो लाभों का ध्यान करते हुए जो व्यक्ति सदा उस प्रभु का गायन करता है वह ‘गातु:' है और इस गायन का ही यह परिणाम है कि वह ‘त्रिविध' तापों से उठा हुआ आत्रेय बनता है।
Essence
शक्ति व ज्ञान की प्राप्ति के लिए हम प्रभु के उपासक बनें।
Subject
उपासना के मुख्य दो लाभ - शक्ति का रहस्य - विषय निवृत्ति में