Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 308

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- देवातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡ध्व꣢र्यो द्रा꣣व꣢या꣣ त्व꣢꣫ꣳ सोम꣣मि꣡न्द्रः꣢ पिपासति । उ꣡पो꣢ नू꣣नं꣡ यु꣢युजे꣣ वृ꣡ष꣢णा꣣ ह꣢री꣣ आ꣡ च꣢ जगाम वृत्र꣣हा꣢ ॥३०८॥

अ꣡ध्व꣢꣯र्यो । द्रा꣣व꣡य꣢ । त्वम् । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । पि꣣पासति । उ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । नून꣢म् । यु꣣युजे । वृ꣡ष꣢꣯णा । हरी꣢꣯इ꣡ति꣢ । आ । च꣣ । जगाम । वृत्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ ॥३०८॥

Mantra without Swara
अध्वर्यो द्रावया त्वꣳ सोममिन्द्रः पिपासति । उपो नूनं युयुजे वृषणा हरी आ च जगाम वृत्रहा ॥

अध्वर्यो । द्रावय । त्वम् । सोमम् । इन्द्रः । पिपासति । उप । उ । नूनम् । युयुजे । वृषणा । हरीइति । आ । च । जगाम । वृत्रहा । वृत्र । हा ॥३०८॥

Samveda - Mantra Number : 308
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जीव अपने को ही प्रेरणा देता हुआ कहता है कि (अध्वर्यो) = अपने साथ अहिंसात्मक यज्ञ को जोड़नेवाले जीव !( त्वम्) = तू (द्रावया) = काम, क्रोध और लोभ आदि की भावनाओं को दूर भगा दे, क्योंकि आज (इन्द्रः) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता यह जीव (सोमम्) = सोम को (पिपासति )= पीना चाहता है। काम, क्रोध आदि के होने पर सोमपान का सम्भव नहीं रहता। इसलिए अहिंसाव्रती बनकर यह सब वासनाओं को दूर भगाता है।

अब यह (वृषणा)=शक्तिशाली इन्द्रियरूपी हरी-घोड़ों को (नूनं उ) = निश्चय से ही (उपयुयुजे)= शरीररूपी रथ में जोतता है (च) = और (वृत्रहा) =  सब रूकावटों को दूर करता हुआ आजगाम अपने घर में आ जाता है ।


(‘हरी’)=घोड़े हैं, ‘इधर-उधर ले-जाते हैं', अतः हरि कहलाते हैं । इन्द्रियाँ भी न जान७ कहाँ-कहाँ ले-जाती हैं, अतः ये भी हरि हैं। ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के गणों के विचार से यहाँ द्विवचन आया है। इन्हें शक्तिशाली बनाना [वृषणा] आवश्यक है, निर्बल बनाकर काबू करने का कोई महत्त्व नहीं क्योंकि तब ये यात्रापथ को तय न कर सकेंगी। जिस दिनय यात्रा पूर्ण करके हम घर पहुँचेंगे उस दिन हम ब्रह्मलोक में उस देव के अतिथि से होंगे। इसी से मन्त्र के ऋषि का नाम 'देवातिथि' है।
Essence
हमारे इन्द्रियरूप घोड़े चरते ही न रहें, हम इन्हें रथ में जोतकर यात्रा को पूर्ण करने का ध्यान करें।
Subject
घर में आ गया