Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 305

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- अश्विनौ वैवस्वतौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
कु꣢ष्ठः꣣ को꣡ वा꣢मश्विना तपा꣣नो꣡ दे꣢वा꣣ म꣡र्त्यः꣢ । घ्न꣣ता꣡ वा꣢मश्न꣣या꣡ क्षप꣢꣯माणो꣣ꣳशु꣢ने꣣त्थ꣢मु꣣ आ꣢द्व꣣न्य꣡था꣢ ॥३०५

कु꣢ । स्थः꣣ । कः꣢ । वा꣣म् । अश्विना । तपानः꣢ । दे꣢वा । म꣡र्त्यः꣢꣯ । घ्न꣣ता꣢ । वा꣣म् । अश्नया꣢ । क्ष꣡प꣢꣯माणः । अं꣣ऽशु꣡ना꣢ । इ꣣त्थ꣢म् । उ꣣ । आ꣢त् । उ꣣ । अन्य꣡था꣢ । अ꣣न् । य꣡था꣢꣯ ॥३०५॥

Mantra without Swara
कुष्ठः को वामश्विना तपानो देवा मर्त्यः । घ्नता वामश्नया क्षपमाणोꣳशुनेत्थमु आद्वन्यथा ॥३०५

कु । स्थः । कः । वाम् । अश्विना । तपानः । देवा । मर्त्यः । घ्नता । वाम् । अश्नया । क्षपमाणः । अंऽशुना । इत्थम् । उ । आत् । उ । अन्यथा । अन् । यथा ॥३०५॥

Samveda - Mantra Number : 305
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्राणापान की साधना करनेवाला व्यक्ति प्राणापान का पुँज बनकर यहाँ 'अश्विनौ' इस नामवाला ही हो गया है- प्राणापान ने इसके अन्धकार को विवासित कर इसे 'वैवस्वतौ' इस यथार्थ नामवाला किया है। ज्ञान के सूर्य से चमकने के कारण यह 'विवस्वान्' तो है ही। यह (कुष्ठः)=इस पृथिवी पर स्थित हुआ- हुआ भी (कः) = कोई विरला ही (मर्त्यः) = व्यक्ति (अश्विना)= प्राणापानो! हे (देवा:) = ज्ञान की दीप्ति देनेवाले! (वाम्) = आप दोनों के (तपान:) = दीप्ति करने के स्वभाववाला (वाम्) = आपकी (घ्नता अश्नया) = सब दोषों को नष्ट करनेवाली व्याप्ति से (क्षयमाणः) = शरीर के रोगों को, मन के दोषों को और बुद्धि की कुण्ठता को नष्ट करता हुआ (अंशुना) = प्रकाश की किरणों से (उ) = निश्चय से (इत्थम्) = ऐसे तो चमकता ही है जैसे कि इहलोक में कोई स्वस्थ, सम्पन्न, सबल व्यक्ति चमका करता है, परन्तु इसके (आत उ) = साथ ही [अपि च] (अन्यथा) = उस विलक्षण [अन्य=विलक्षण] रीति से भी शोभायमान होता है जिससे कि कोई सात्त्विक आध्यात्मिक उन्नति सम्पन्न व्यक्ति चमका करता है, अर्थात् यह प्राणापान को दीप्त करनेवाला व्यक्ति अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों को सिद्ध करनेवाला होता है। प्रेय व श्रेय दोनों का इसके जीवन में उचित समन्वय होता है। यह इहलोक व परलोक दोनों का कल्याण प्राप्त करता है। प्राणापान की साधना इसे प्रभुता के आकर्षण से बचाकर प्रभु की ओर ले जाती है। प्रभु की प्राप्ति इसे प्रभुता तो प्राप्त करा ही देती है।

‘तपान:' संकेत कर रहा है कि प्राणापान की साधना हमारा स्वभाव बन जाए, उसके बिना हम रह ही न सकें। 'अशुना' शब्द संकेत करता है कि यह साधना हमें दीप्त करेगी। सूर्य की किरणों की भाँति हम भी ज्ञान की किरणोंवाले होंगे । 'घ्नता अश्नया' से स्पष्ट है कि जहाँ-जहाँ इनका संयम करेंगे वहाँ-वहाँ ये दोषों को दग्ध कर देंगे, परन्तु इस पृथिवी पर कोई विरला व्यक्ति ही इस साधना में तत्पर होता । प्राणापान हमारे भोजन को सूक्ष्म करता हुआ हमें भौतिकता से ऊपर उठाता है। ('कण्ठकूपे क्षुत्पिपासा निवृतिः') = इस योगसूत्र के अनुसार तो हम सचमुच 'अब्भक्ष' और 'वायुभक्ष' बनकर पार्थिवता से ऊपर ही उठ जाते हैं। हमें द्युलोक में पहुँचना तो है ही, अतः इस साधना को अपनाना ही ठीक है।
Essence
प्राणापान की साधना से मैं ऐसे भी चमकूँ और वैसे भी।
Subject
इस प्रकार भी, उस प्रकार भी