Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 301

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ हि वृ꣢꣯त्रहन्तम꣣ ह꣡री꣢ इन्द्र परा꣣व꣡तः꣢ । अ꣣र्वाचीनो꣡ म꣢घव꣣न्त्सो꣡म꣢पीतय उ꣣ग्र꣢ ऋ꣣ष्वे꣢भि꣣रा꣡ ग꣢हि ॥३०१॥

यु꣣ङ्क्ष्व꣢ । हि । वृ꣣त्रहन्तम । वृत्र । हन्तम । ह꣢रीइ꣡ति꣢ । इ꣣न्द्र । पराव꣡तः꣢ । अ꣣र्वाचीनः꣢ । अ꣣र्वा । अचीनः꣢ । म꣣घवन् । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये । उग्रः꣢ । ऋ꣣ष्वे꣡भिः꣢ । आ । ग꣣हि ॥३०१॥

Mantra without Swara
युङ्क्ष्वा हि वृत्रहन्तम हरी इन्द्र परावतः । अर्वाचीनो मघवन्त्सोमपीतय उग्र ऋष्वेभिरा गहि ॥

युङ्क्ष्व । हि । वृत्रहन्तम । वृत्र । हन्तम । हरीइति । इन्द्र । परावतः । अर्वाचीनः । अर्वा । अचीनः । मघवन् । सोमपीतये । सोम । पीतये । उग्रः । ऋष्वेभिः । आ । गहि ॥३०१॥

Samveda - Mantra Number : 301
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु मेध्यातिथि से कहते हैं कि हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! (वृत्रहन्तम्) = वासनारूप विघ्नों को सर्वाधिक नष्ट करनेवाले ! तू (हि) = निश्चय से (हरी युव-इन) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप घोड़ों को रथ में जोत्। ये तेरा हरण करते हैं तभी तो हरि हैं। दूर दूर देशों में ये भटकते हैं। उन (परावतः) = दूर दूर देशों से इन्हें वापिस लाकर तू इस शरीररूप रथ में जोतकर अपनी जीवनयात्रा में आगे बढ़नेवाला बन । भोग ही न भोगता रह - अपनी यात्रा प्रारम्भ कर यह यात्रा का आरम्भ कर |

इस प्रकार होगा कि तू (अर्वाचीन:) = अपने अन्दर गति करनेवाला बन। पराचीन नहीं अर्वाचीन। औरों के दोषों को ढूँढ़नेवाला न होकर अपने दोषों को ढूँढनेवाला बन। आत्मनिरीक्षण से ही इस यात्रा का प्रारम्भ होता है। काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रु कहाँ-कहाँ छिपे बैठे हैं, उन्हें ढूंढ-ढूँढकर तू समाप्त कर डाल। ‘शत्रु-घ्न' बन । (मघवन्) = पाप के लवलेश से शून्य [मा+अघ] इस सम्बोधन से भी तो यही प्रेरणा विद्यमान है। वासनाओं से उसूपर उठकर तू (सोमपीतये) = सोम के पान के लिए समर्थ होगा, इससे (उग्रः) = ‘उदात्त', तेरा जीवन ऊँचा होगा। तू तेजस्वी भी बनेगा और अब (ऋण्वेभिः) = महान् - उदार आशयों के साथ तू (आगहि) = मेरे समीप आ जा।

प्रभु तो जीव को पुकार- पुकार का अपने समीप बुला रहे हैं, पर जीव सुने तब न? प्रभु की वाणी को सुननेवाला जीव महान् बनता है - उदार बनता है। आत्मप्राप्ति के साथ इस यात्रा का अन्त होता है। आत्मनिरीक्षण से यह प्रारम्भ हुई थी, आत्पप्राप्ति पर आज समाप्त हुई है।
 
Essence
यात्रा करनेवाला मैं निरन्तर मेध्य प्रभु की ओर चलनेवाला ‘मेध्यतिथि’ बनूँ।
Subject
आजा, घोड़ों को जोत, ये चरते ही न रहें