Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 294

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣡ इ꣡न्द्र꣣ म꣡दा꣢य ते꣣ सो꣡मा꣢श्चिकित्र उ꣣क्थि꣢नः꣣ । म꣡धोः꣢ पपा꣣न꣡ उप꣢꣯ नो꣣ गि꣡रः꣢ शृणु꣣ रा꣡स्व꣢ स्तो꣣त्रा꣡य꣢ गिर्वणः ॥२९४

इ꣣मे꣢ । इ꣣न्द्र । म꣡दा꣢꣯य । ते꣣ । सो꣡माः꣢꣯ । चि꣣कित्रे । उक्थि꣡नः꣢ । म꣡धोः꣢꣯ । प꣣पानः꣢ । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । गि꣡रः꣢꣯ । शृ꣣णु । रा꣡स्व꣢꣯ । स्तो꣣त्रा꣡य꣢ । गि꣣र्वणः । गिः । वनः ॥२९४॥

Mantra without Swara
इम इन्द्र मदाय ते सोमाश्चिकित्र उक्थिनः । मधोः पपान उप नो गिरः शृणु रास्व स्तोत्राय गिर्वणः ॥२९४

इमे । इन्द्र । मदाय । ते । सोमाः । चिकित्रे । उक्थिनः । मधोः । पपानः । उप । नः । गिरः । शृणु । रास्व । स्तोत्राय । गिर्वणः । गिः । वनः ॥२९४॥

Samveda - Mantra Number : 294
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु जीव से कहते हैं कि (इन्द्र) = हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव (इमे सोमा:) = ये सोम (ते मदाय) = तेरे हर्ष के लिए हैं, तेरे जीवन को उल्लासमय बनाने के लिए हैं। ये (सोम चिकित्रे) = [कित–निवास, रोगापनयन, ज्ञान] तेरे उत्तम निवास के लिए हैं। इनके होने पर शरीर में तेरी स्थिति अधिकाधिक अच्छी ही होती जाएगी। ये सोम तेरे रोगों के दूर करने के कारण बनेंगे, साथ ही ये तेरी ज्ञान की वृद्धि के भी कारण होंगे। उक्थिन:- ये तुझे स्तोत्रोंवाला बनाएँगे, अर्थात् तेरी रुचि उस प्रभु के स्तवन की ओर होगी। 

एवं, सोमरक्षा के ‘हर्ष, उत्तमनिवास, नीरोगता, ज्ञान, प्रभु-भक्ति-प्रवणता' आदि लाभों का उल्लेख करके कहते हैं कि (मधो:) = इस मधुरतम वस्तु सोम का (पपान:) = खूब पान करते हुए (नः गिरः)-हमारी इन वेदवाणियों को (उपश्रृणु) = समीपता से सुननेवाला हो। (गिर्वणः) = वेदवाणियों का सवन करनेवाला होता हुआ (स्तोत्राय रास्व) = अपने को प्रभु के स्तोत्रों के लिए दे डाल, अर्थात् प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाला बन । =

मानव-जीवन में मनुष्य का मूल कर्तव्य यही है कि संयमी बनकर हृदयस्थ प्रभु की वाणी को सुने और प्रभु के प्रति अपना अर्पण कर डाले। ऐसा करने पर ही उसका जीवन सुन्दर और दिव्य गुणोंवाला बनता है, अर्थात् वह वामदेव होता है और इन्द्रियों की निर्मलता के कारण 'गोतम' होता है।
Essence
हम अपने जीवन की ऐसी साधना करें कि प्रभु के उपदेशों को सुननेवाले बन सकें।
Subject
हमारी वाणियों को सुन