Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 293

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣡ इन्द्रा꣢꣯य सुन्विरे꣣ सो꣡मा꣢सो꣣ द꣡ध्या꣢शिरः । ता꣡ꣳ आ मदा꣢य वज्रहस्त पी꣣त꣢ये꣣ ह꣡रि꣢भ्यां या꣣ह्यो꣢क꣣ आ꣢ ॥२९३॥

इ꣣मे꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सु꣣न्विरे । सो꣡मा꣢꣯सः । द꣡ध्या꣢꣯शिरः । द꣡धि꣢꣯ । आ꣣शिरः । ता꣢न् । आ । म꣡दा꣢꣯य । व꣣ज्रहस्त । वज्र । हस्त । पीत꣡ये꣢ । ह꣡रि꣢꣯भ्याम् । या꣣हि । ओ꣡कः꣢꣯ । आ । ॥२९३॥

Mantra without Swara
इम इन्द्राय सुन्विरे सोमासो दध्याशिरः । ताꣳ आ मदाय वज्रहस्त पीतये हरिभ्यां याह्योक आ ॥

इमे । इन्द्राय । सुन्विरे । सोमासः । दध्याशिरः । दधि । आशिरः । तान् । आ । मदाय । वज्रहस्त । वज्र । हस्त । पीतये । हरिभ्याम् । याहि । ओकः । आ । ॥२९३॥

Samveda - Mantra Number : 293
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इमे (सोमासः) = ये सोमकण (सुन्विरे) = पैदा किये गये हैं। क्यों? (इन्द्राय) = प्रभु की प्राप्ति के लिए। जड़ जगत् की इस सर्वोत्तम वस्तु से हमने चेतन जगत् की सर्वोत्तम वस्तु को पाना है। ‘ब्रह्मचर्य' शब्द, जिसका धात्वीय अर्थ 'ब्रह्म की ओर जाना है', का अर्थ ही शक्ति का संयम हो गया है। यह संयत शक्ति ही हमें परमेश्वर को प्राप्त कराती है। इस प्रकार मुख्यरूप से इन सोमकणों का लाभ प्रभु - प्राप्ति ही है। प्रासंगिक रूप से ये (दध्यशिरः) = धारणशक्ति से युक्त हैं, अर्थात् शरीर में धारण किये जाकर ये शरीर के स्वास्थ्य को स्थिर रखनेवाले होते हैं। मन:प्रसाद व बुद्धि-नैर्मल्य का भी ये कारण बनते हैं।

हे (तान्) = जीव! इन सोमकणों को तू इसलिए भी धारण कर कि ये तेरे (मदाय) = हर्ष का कारण होंगे। सोमरक्षा जीवन को उल्लासमय बना देती है, अतः ‘प्रभु-प्राप्ति', ‘धारणशक्ति' व ‘हर्ष' इन तीन उद्देश्यों से हे (वज्रहस्त) ! - (तू पीतये) = इनकी रक्षा के लिए प्रयत्नशील हो। ‘वज्रहस्त' शब्द का अभिप्राय है, जिसके हाथ में [वज्= गतौ] = गतिशीलता हो। क्रियामय जीवन ही हमें सोमरक्षा के योग्य बनाता है। इनकी रक्षा के लिए ही प्रभु जीव से कहते हैं कि (हरिभ्याम्) = तू अपने इन इन्द्रियरूप घोड़ों से (ओके) = अपने शरीररूप घर में (आयाहि) = आ। इन्द्रियों को विषयों की ओर न जाने देगा तो तू वासनाओं में न फँसने के कारण इन सोमकणों की रक्षा कर पाएगा। एवं, सोमकणों की रक्षा के मुख्यरूप से ये दो ही साधन हैं–क्रियाशील बनना और इन्द्रियों को बाहर भटकने से रोकना । इस सुरक्षित वीर्य से जीवन उल्लासमय होगा, धारणशक्ति प्राप्त होगी और अन्त में तू प्रभु को प्राप्ति।

इन्द्रियों को वश में करके यह वसिष्ठ सचमुच प्रभु को प्राप्त कर सका है, परन्तु यह वसिष्ठ इसलिए बन पाया है क्योंकि यह मैत्रावरुणि प्राणापान की साधना करनेवाला हुआ। इस प्रकार क्रम यह है - १. प्राणापान की साधना से २. वसिष्ठ बनेंगे, ३. इन्द्रियों को विषयों में जाने से रोक पाएँगे, ४. वासना का शिकार न होने से सोम की रक्षा सम्भव होगी, ५. इससे जीवन स्वस्थ व उल्लासमय होगा और अन्त में प्रभु की प्राप्ति होगी।
Essence
हम इन्द्रियों को विषयों में न भटकने दें।
Subject
घर में आ भटक नहीं