Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 291

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
म꣣हे꣢ च꣣ न꣢ त्वा꣢द्रिवः꣣ प꣡रा꣢ शु꣣ल्का꣡य꣢ दीयसे । न꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢य꣣ ना꣡युता꣢꣯य वज्रिवो꣣ न꣢ श꣣ता꣡य꣢ शतामघ ॥२९१॥

म꣣हे꣢ । च꣣ । न꣢ । त्वा꣣ । अद्रिवः । अ । द्रिवः । प꣡रा꣢꣯ । शु꣣ल्का꣡य꣢ । दी꣣यसे । न꣢ । स꣣ह꣡स्रा꣢य । न । अ꣣यु꣡ता꣢य । अ꣣ । यु꣡ता꣢꣯य । व꣣ज्रिवः । न꣢ । श꣣ता꣡य꣢ । श꣣तामघ । शत । मघ ॥२९१॥

Mantra without Swara
महे च न त्वाद्रिवः परा शुल्काय दीयसे । न सहस्राय नायुताय वज्रिवो न शताय शतामघ ॥

महे । च । न । त्वा । अद्रिवः । अ । द्रिवः । परा । शुल्काय । दीयसे । न । सहस्राय । न । अयुताय । अ । युताय । वज्रिवः । न । शताय । शतामघ । शत । मघ ॥२९१॥

Samveda - Mantra Number : 291
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु (अद्रिवः) = [न दृ] - न विदारण करनेवाले हैं। परन्तु कब ? जबकि मनुष्य संसार के प्रलोभनों में न फँसता हुआ अपने जीवन-पथ पर आगे बढ़ता जाता है। जब यह प्रकृति की ओर ही झुक जाता है और इसकी शक्ति प्राकृतिक सम्पत्ति को जुटाने में ही लग जाती है तो उस समय वे प्रभु उसके लिए (वज्रिः) = वज्रवाले बन जाते हैं। वज्र से उसका वे विदारण कर देते हैं। अत: मेधातिथि तो निश्चय करता है कि हे प्रभो! (त्वाम्) = आप (महे च शुल्काय) = महान् धनराशि के लिए भी मुझसे छोड़े नहीं जाते हो। कितना भी धन हो । ('न वित्तेन तर्पणी मनुष्यः')=धन से मनुष्य सदा अतृप्त रहता है, अतः धन के लिए प्रभु को क्यों छोड़ना? (स-हस्त्राय न)=आमोद-प्रमोदमय जीवन के लिए भी आप नहीं छोड़े जाते। ये आमोद-प्रमोद व विलास तो ('सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः') = इन्द्रिय-शक्तियों को जीर्ण करते हैं। इनके लिए प्रभु को छोड़ना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। (न अयुताय) = मैं इसलिए भी प्रभु को नहीं छोड़ता कि मैं फूले-फले पुत्र-पौत्रोंवाले परिवार से संयुक्त बना रहूँ। जो व्यक्ति प्रभु को छोड़ देता है वह समय आने पर अनुभव करता है कि उसने सदा साथ देनेवाले प्रभु को छोड़ उनको अपनाया है जोकि अन्त तक साथ नहीं दे सकते। प्रभु के अतिरिक्त कोई भी अन्त तक साथ नहीं देता। (न शताय) = पूरे सौ वर्ष जीने के लिए भी मैं आपको नहीं छोड़ता, अतः प्रभु का परादान किसी भी प्रलोभन के लिए ठीक नहीं । वास्तविकता तो यह है कि ये (शतामघ) = सैकड़ों प्रकार के ऐश्वर्यवाले हैं। अन्ततोगत्वा सब ऐश्वर्य उसी प्रभु के हैं। प्रभु मिले, तो ऐश्वर्य तो अपने आप मिल गये, अतः यह मेधातिथि तो किसी भी प्रलोभन में न फँसता हुआ उस पवित्र प्रभु की ओर चलता है और इसी से 'मेधातिथि' नामवाला होता है। इसने प्रभु को पाकर सभी कुछ पा लिया। इसके विपरीत एक दूसरे व्यक्ति ने सब कुछ जुटाने के प्रयत्न में प्रभु को खोकर सभी कुछ खो दिया । अतः मेध्यातिथि ही काण्व है- मेधावी है।
Essence
न धन के लिए, न विलास के लिए, न समृद्ध कुटुम्ब के लिए और न ही दीर्घ जीवन के लिए हम प्रभु को छोड़ें। प्रत्युत आत्मा के लिए सम्पूर्ण पृथिवी व पार्थिव भोगों को हम छोड़नेवाले हों। ('आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्) । 
Subject
आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्