Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 287

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
श꣡ची꣢भिर्नः शचीवसू꣣ दि꣢वा꣣ न꣡क्तं꣢ दिशस्यतम् । मा꣡ वा꣢ꣳ रा꣣ति꣡रुप꣢꣯ दसत्क꣣दा꣢च꣣ना꣢꣫स्मद्रा꣣तिः꣢ क꣣दा꣢च꣣न꣢ ॥२८७॥

श꣡ची꣢꣯भिः । नः꣣ । शचीवसू । शची । वसूइ꣡ति꣢ । दि꣡वा꣢꣯ । न꣡क्त꣢꣯म् । दि꣣शस्यतम् । मा꣢ । वा꣣म् । रातिः꣢ । उ꣡प꣢꣯ । द꣣सत् । कदा꣢ । च꣣ । न꣣ । अ꣣स्म꣢त् । रा꣣तिः꣢ । क꣣दा꣢ । च꣣ । न꣢ ॥२८७॥

Mantra without Swara
शचीभिर्नः शचीवसू दिवा नक्तं दिशस्यतम् । मा वाꣳ रातिरुप दसत्कदाचनास्मद्रातिः कदाचन ॥

शचीभिः । नः । शचीवसू । शची । वसूइति । दिवा । नक्तम् । दिशस्यतम् । मा । वाम् । रातिः । उप । दसत् । कदा । च । न । अस्मत् । रातिः । कदा । च । न ॥२८७॥

Samveda - Mantra Number : 287
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वैदिक साहित्य में पति-पत्नी 'अश्विनौ' कहलाते हैं। उन्हें प्रभु कहते हैं कि हे (शचीवसू) = [शची=प्रज्ञा, शची-कर्म] प्रज्ञा और कर्मरूप उत्तम सप्तत्तियोंवालों! (नः) = हमें, हमारे प्रति (दिवानक्तम्)=दिनरात (शचीभिः) = ज्ञानों व कर्मों द्वारा (दिशस्यतम्) = [दिश अतिसर्जने] समर्पण करने की इच्छा करो। भक्ति समर्पण का ही नाम है। परन्तु समर्पण किसका? अपने भक्तिभाजन के प्रति समर्पण के लिए उत्तमोत्तम ज्ञानों व कर्मों का संग्रह करो जिससे इनका प्रभु के प्रति समर्पण कर सको। जो गृहस्थ ज्ञान व सत्कर्मों का संचय नहीं करते, उनके जीवनों में प्रभु की उपासना का भी अभाव है।

ज्ञान और कर्म के साथ तीसरी आवश्यक वस्तु 'दान' है। प्रभु कहते हैं कि (वाम्) = तुम दोनों की (राति:) = दान देने की प्रक्रिया (कदाचन्) = कभी भी (उपदसत्) = नष्ट (मा) = न हो। जो मनुष्य देता रहता है वह प्रकृति में आसक्ति व लगाववाला नहीं होता । प्रभु कहते हैं कि (अस्मद् रातिः) = यह हमारा दान तेरे द्वारा चलता हुआ (कदाचन) = कभी (मा उपदसत्) = नष्ट न हो। दान तो प्रभु कर रहे हैं, जीव तो बीच में निमित्तमात्र है।

इस प्रकार ‘प्रज्ञा, कर्म व दान' इस त्रयी को अपनानेवाला व्यक्ति दस महान् देव का सच्चा सेवक दास है, अतः यह 'दैवोदासि' कहलाता है और इसके पर्व-पर्व में अङ्ग-प्रत्यङ्ग में शक्ति होती है और यह 'परुच्छेप' नामवाला होता है।
Essence
प्रज्ञा हमारे मस्तिष्क को उज्ज्वल करे, कर्म हमें शक्तिशाली बनाएँ और दान हमें प्रकृति में अनासक्त बनाकर उस देव का सच्चा दास बनाए ।
Subject
प्रज्ञा, कर्म, दान