Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 284

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
मो꣡ षु त्वा꣢꣯ वा꣣घ꣡त꣢श्च꣣ ना꣢꣫रे अ꣣स्म꣡न्नि री꣢꣯रमन् । आ꣣रा꣡त्ता꣣द्वा सध꣣मा꣡दं꣢ न꣣ आ꣡ ग꣢ही꣣ह꣢ वा꣣ स꣡न्नुप꣢꣯ श्रुधि ॥२८४॥

मा꣢ । उ꣣ । सु꣢ । त्वा꣣ । वाघ꣡तः꣢ । च꣣ । न꣢ । आ꣣रे꣢ । अ꣣स्म꣢त् । नि । री꣣रमन् । आरा꣡त्ता꣢त् । वा꣣ । सधमा꣡द꣢म् । स꣣ध । मा꣡द꣢꣯म् । नः꣣ । आ꣢ । ग꣣हि । इह꣢ । वा꣣ । स꣢न् । उ꣡प꣢꣯ । श्रु꣣धि ॥२८४॥

Mantra without Swara
मो षु त्वा वाघतश्च नारे अस्मन्नि रीरमन् । आरात्ताद्वा सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि ॥

मा । उ । सु । त्वा । वाघतः । च । न । आरे । अस्मत् । नि । रीरमन् । आरात्तात् । वा । सधमादम् । सध । मादम् । नः । आ । गहि । इह । वा । सन् । उप । श्रुधि ॥२८४॥

Samveda - Mantra Number : 284
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वसिष्ठ मैत्रावरुणि कहता है कि हे प्रभो! (त्वा) = तुझे (वाघत:) = तेरा वहन [धारण] करनेवाले विद्वान् लोग (चन) = भी (आरे अस्मत्) = हमसे दूर (सूनिरीरमन्) = आनन्दित मा (उ) = करें, अर्थात् विद्वान् लोग आपकी जो चर्चा करें वह हमारे समीप हो। हम विद्वानों के सम्पर्क में हों और उनके द्वारा की जानेवाली आपके विषय की चर्चाओं को सुनें।

(वा)=अथवा हे प्रभो! (आरात्तात्) दूर से (नः) = हमारे (सधमादम्) = आपके साथ मिलकर आनन्द का अनुभव करने के स्थान पर (आगहि) = आइए, अर्थात हम घर के सब व्यक्ति मिलकर आपके साथ जहाँ आनन्द का अनुभव करें उस हमारे उपासना स्थान में ही आप आइए। हम विद्वानों के द्वारा आपके सम्पर्क में आने के स्थान पर सीधे आपके सम्पर्क में आकर आपके समीपतर हो जाएँ और सबसे उत्तम बात तो यह है कि (इह) = यहाँ हमारे हृदयों में ही (वा) = निश्चय से (सन्) = उपस्थित होते हुए (उपश्रुधि) = हमारी प्रार्थना वाणियों को सुनिए अथवा हमें वेदवाणियों के द्वारा ज्ञान का श्रवण कराइए । जिस दिन हृदयस्थ आपसे हम वेदज्ञान को सुन रहे होंगे उस दिन हम आपके समीपतर हो जाएँगे।

इस प्रकार वसिष्ठ की कामना तो यही है कि वह प्रभु के समीप, समीपतर व समीपतम होता जाए। वस्तुतः मनुष्य जितना - जितना इन्द्रियों को वशीभूत करके वसिष्ठ बनता जाता है, उतना-उतना वह प्रभु के समीप पहुँचता जाता है। वशी समीप पहुँचता है तो वशीतर-समीपतर पहुँच जाता है और वशितम= वसिष्ठ समीपतम पहुँच जाता है।
Essence
हम अधिकाधिक वशी बनते हुए प्रभु के अधिक और अधिक समीप पहुँचते जाएँ। 
Subject
समीप, समीपतर और समीपतम