Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 267

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
श्रा꣡य꣢न्त इव꣣ सू꣢र्यं꣣ वि꣡श्वेदिन्द्र꣢꣯स्य भक्षत । व꣡सू꣢नि जा꣣तो꣡ जनि꣢꣯मा꣣न्यो꣡ज꣢सा꣣ प्र꣡ति꣢ भा꣣गं꣡ न दी꣢꣯धिमः ॥२६७॥

श्रा꣡य꣢꣯न्तः । इ꣣व । सू꣡र्य꣢꣯म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । इत् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । भ꣣क्षत । व꣡सू꣢꣯नि । जा꣣तः꣢ । ज꣡नि꣢꣯मानि । ओ꣡ज꣢꣯सा । प्र꣡ति꣢꣯ । भा꣣ग꣢म् । न । दी꣣धिमः ॥२६७॥

Mantra without Swara
श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिमः ॥

श्रायन्तः । इव । सूर्यम् । विश्वा । इत् । इन्द्रस्य । भक्षत । वसूनि । जातः । जनिमानि । ओजसा । प्रति । भागम् । न । दीधिमः ॥२६७॥

Samveda - Mantra Number : 267
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(श्रम)=इस मन्त्र का ऋषि ‘नृमेध’ मनुष्यों के साथ मिलकर चलनेवाला है। यह कहता है कि (सूर्यम् इव) = सूर्य के समान (श्रायन्तः)=[श्रै=to sweat, to perspire] अत्यन्त श्रम के
कारण पसीने से तर-बतर होते हुए (विश्वा इत्) = सभी मिलजुलकर (इन्द्रस्य) = उस प्रभु के अन्नों का (भक्षत्)=सेवन करो। ‘श्रायन्त इव सूर्यम्'- इस उपमा से स्पष्ट है कि सबको अपनी शक्ति के अनुसार काम करना है, बिना श्रम के किसी को खाने का अधिकार नहीं है। साम्यवाद का मौलिक सिद्धान्त यही है ‘जो जितना कार्य कर सकता है, वह उतना कार्य करे ही '। 

(भोजन) 'उस श्रम से उत्पन्न धनों का आवश्यकतानुसार विभाजन हो । ' वेद कहता है कि (ओजसा) = शक्ति से (जाता) = उत्पन्न हुए-हुए (उ) = और (जनिमानि) = पैदा होनेवाले (वसूनि) = धनों को (प्रतिभागं न)= आवश्यकता के अनुसार भज= [= सेवायाम्, भागम् - जितना सेवनीय हो] (दीधिम)=धारण करें।

वह समाज, ‘जिसमें सब अपनी शक्ति के अनुसार कार्य करते हैं, और आवश्यकता के अनुसार खाना पाते हैं', आदर्श समाज है। प्रत्येक घर में यही व्यवस्था चलती है। वहाँ शक्ति के अनुसार सभी कार्य करते हैं, परन्तु कुछ भी न कमानेवाले बच्चे को सबसे अधिक दूध मिलता है। बस, इस घर में लागू हुए - हुए नियम को ही सारे समाज में व्यापक कर देना चाहिए। इस नियम के पालन के बिना जैसे घर नहीं चल सकता, इसी प्रकार यह नियम सामाजिक जीवन के उत्थान के लिए भी आवश्यक है। ऐसे समाज में सब मिल-जुलकर चलते हैं, (‘नृ-मेध') = हैं और अनासक्त होने से सदा कार्यों में व्याप्त रहने से ये ‘आङ्गिरस' हैं। इनका एक-एक अङ्ग रस व शक्तिवाला है।
Essence
हमारे समाज का आदर्श-वाक्य यह हो कि ‘कार्य शक्ति के अनुसार और धन का विभाग आवश्यकता के अनुसार '|
Subject
साम्यवाद [ १ ] - कार्यशक्ति के अनुसार, भोजन आवश्यकतानुसार