Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 265

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ वो꣢ वी꣣र꣡मन्ध꣢꣯सो꣣ म꣡दे꣢षु गाय गि꣣रा꣢ म꣣हा꣡ विचे꣢꣯तसम् । इ꣢न्द्रं꣣ ना꣢म꣣ श्रु꣡त्य꣢ꣳ शा꣣कि꣢नं꣣ व꣢चो꣣ य꣡था꣢ ॥२६५॥

अ꣣भि꣢ । वः꣣ । वीर꣢म् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡दे꣢꣯षु । गा꣣य । गिरा꣢ । म꣣हा꣢ । विचे꣢꣯तसम् । वि । चे꣣तसम् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ना꣡म꣢꣯ । श्रु꣡त्य꣢꣯म् । शा꣣कि꣡न꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । य꣡था꣢꣯ ॥२६५॥

Mantra without Swara
अभि वो वीरमन्धसो मदेषु गाय गिरा महा विचेतसम् । इन्द्रं नाम श्रुत्यꣳ शाकिनं वचो यथा ॥

अभि । वः । वीरम् । अन्धसः । मदेषु । गाय । गिरा । महा । विचेतसम् । वि । चेतसम् । इन्द्रम् । नाम । श्रुत्यम् । शाकिनम् । वचः । यथा ॥२६५॥

Samveda - Mantra Number : 265
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि 'वत्स' है- जो प्रभु की स्तुति का उच्चारण करता है [ वदति], अतएव प्रभु का प्रिय है। यह अपने मित्रों से कहता है कि प्रभु (वः) = आपके शत्रुओं को (वीरम्) = विशेष रूप से कम्पित करके दूर करनेवाले हैं, महा (विचेतसम्) = महान् व विशिष्ट ज्ञानवाले हैं, उस प्रभु को लक्ष्य करके अभिगाय-खूब गायन करो। ऐसा तुम कर तभी सकोगे जबकि तुम्हारा निवास (अन्धसः) = आध्यातव्य सोम के (मदेषु) = मदों में होगा। सोम आध्यातव्य है। जो सोम अन्न के सप्तम स्थल में उत्पन्न होता है - वह सोम कितना ध्यान देने योग्य है? जब मनुष्य उसका ध्यान करता है तो उसका जीवन विशेष हर्ष व आनन्दवाला होता है। इस सोम की रक्षा करने पर शरीर नीरोग रहता है, मन निर्मल व बुद्धि तीव्र । इसीलिए इस सोम का पान करनेवाला व्यक्ति प्रभु का उपासक होता है, प्रभु के गुणों का गायन करता है।

वत्स कहता है कि (वचो यथा) = वेदवाणी में जैसा उपदेश दिया गया है, उसी प्रकार उस प्रभु का गायन करो - जो (इन्द्रं नाम) = ज्ञानरूप परमैश्वर्यवाला है और बल के सब कार्यों को करनेवाला है। (श्रुत्यम्) = जो ज्ञान प्राप्त करानेवालों में सर्वोत्तम है। आचार्यों से भी ज्ञान प्राप्त होता है, परन्तु सर्वमहान् आचार्य तो वे प्रभु ही हैं। उस प्रभु के सम्पर्क में आने पर सारा अन्तरिक्ष ज्ञान के प्रकाश से जगमगा उठता है, क्योंकि प्रभु के ज्ञान का स्रोत अन्दर से उमड़ता है। (शाकिनम्) = वे प्रभु हमें शक्तिशाली बनानेवाले हैं। प्रभु की शक्ति का प्रवाह हमारे अन्दर भी बहने लगता है। अग्नि के सम्पर्क में आकर लोहे का गोला भी अग्नि की भाँति तमतमाने लगता है। इसी प्रकार जीव भी ब्रह्म के सम्पर्क में आकर 'ब्रह्म इव' हो जाता है । जीव भी ब्रह्म का छोटा-स - सा रूप बन जाता है।
Essence
हम सोम की रक्षा करें। सोम के आनन्द में प्रभु का गायन करें। प्रभु वीर हैं, उनके गुणगान से हममें शक्ति का प्रवाह बहेगा। प्रभु महाविचेतस् हैं- हममें भी ज्ञान का प्रकाश होगा।
Subject
ज्ञान का प्रकाश, शक्ति का प्रवाह