Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 261

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣣यं꣡ घ꣢ त्वा सु꣣ता꣡व꣢न्त꣣ आ꣢पो꣣ न꣢ वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषः । प꣣वि꣡त्र꣢स्य प्र꣣स्र꣡व꣢णेषु वृत्रह꣣न्प꣡रि꣢ स्तो꣣ता꣡र꣢ आसते ॥२६१॥

व꣣य꣢म् । घ꣣ । त्वा । सुता꣡व꣢न्तः । आ꣡पः꣢꣯ । न । वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषः । वृ꣣क्त꣢ । ब꣣र्हिषः । पवि꣡त्र꣢स्य । प्र꣣स्र꣡व꣢णेषु । प्र꣣ । स्र꣡व꣢꣯णेषु । वृ꣣त्रहन् । वृत्र । हन् । प꣡रि꣢꣯ । स्तो꣣ता꣡रः꣢ । आ꣣सते ॥२६१॥

Mantra without Swara
वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः । पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन्परि स्तोतार आसते ॥

वयम् । घ । त्वा । सुतावन्तः । आपः । न । वृक्तबर्हिषः । वृक्त । बर्हिषः । पवित्रस्य । प्रस्रवणेषु । प्र । स्रवणेषु । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । परि । स्तोतारः । आसते ॥२६१॥

Samveda - Mantra Number : 261
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो ! (स्तोतारः) = स्तोता लोग (घ)= निश्चय से (त्वा) = आपके (परि आसते) = आस-पास ही रहते हैं, आपसे दूर नहीं जाते। आप हे (वृत्रहन्) = वृत्रों के नाशक! आपके समीप रहने से वे स्तोता भी वृत्रों को समाप्त करने में समर्थ होते हैं। आपके समीप रहनेवालों को ये (वृत्र) = वासनाएँ पीड़ित नहीं करतीं। ये लोग (पवित्रस्य) = परमपवित्र आपके (प्रस्त्रवणेषु) = र - सहस्रधार स्रोतों के अन्दर स्नान कर रहे होते हैं। जैसे ('स्विन्नः स्नातो मलादिव') = जल से स्नान करनेवाला व्यक्ति पसीना आदि मलों से रहित हो जाता है, उसी प्रकार आपमें स्नान करके यह स्तोता मन व बुद्धि के मलों से रहित हो जाता है।
आपके पवित्र चश्मों में स्नान करनेवाले व्यक्तियों के लक्षण निम्न हैं—

१. (वयम्) = [वेञ् तन्तुसन्ताने] ये लोग कभी भी कर्मतन्तु का विच्छेद नहीं होने देते। इन्हें यह नहीं भूलता कि ये आत्मा हैं- [अत् सातत्यगमने] सतत गमन ही उनका स्वरूप है। लिए प्रभु का आदेश ('कुर्वन्नेवेह कर्माणि') कर्म करते हुए ही जीने का है। 

२. (सुतावन्त:)=[सुतं = ज्ञानम्] ये उत्तम ज्ञानवाले होते हैं। ये प्रकृति के तत्त्वों को समझने का प्रयत्न करते हैं और जीवों की प्रकृति का अध्ययन करते हैं। इन दोनों में ही इन्हें प्रभु की महिमा दृष्टिगोचर होती है।

३. (आपः न) = ये जलों की भाँति होते हैं। जल पवित्र करनेवाला है। इनके सम्पर्क में आनेवाला प्रत्येक व्यक्ति भी पविसत्रता का अनुभव करता है। ये जलों की भाँति ही शान्त होते हैं और स्वाभाविक रूप से क्रिया करनेवाले होते हैं।

४. (वृक्तबर्हिषः) = [वृजी वर्जने] दूर किया है उखाड़ने योग्य वासनाओं को जिन्होंने। जैसे किसान खेत से घास- -फूँस को उखाड़कर खेत को स्वच्छ कर डालता है, उसी प्रकार ये लोग मन की मलिनता को दूर कर उसे पवित्र कर डालते हैं। इसी पवित्र स्थान पर वे प्रभु को देखने का प्रयत्न करते हैं। इसमें बुद्धिमत्ता नहीं कि हम प्रभु को बाहर बैठा दें। मूर्तिपूजक यही ग़लती करता है। यदि हमारे जीवनों में ल्लखित चार बातें नहीं हैं तो वस्तुतः हम प्रभु के पवित्र प्रस्त्रवणों में स्नान नहीं कर रहे ।
Essence
हमारे जीवनों में क्रियाशीलता हो, उत्तम ज्ञान हो, शान्ति हो और मन का नैर्मल्य हो ।
Subject
पवित्र चश्मों में स्नान