Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 255

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणादित्याः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ मि꣣त्रा꣢य꣣ प्रा꣢र्य꣣म्णे꣡ स꣢च꣣꣬थ्य꣢꣯मृतावसो । व꣣रूथ्ये꣢३ व꣡रु꣢णे꣣ छ꣢न्द्यं꣣ व꣡चः꣢ स्तो꣣त्र꣡ꣳ राज꣢꣯सु गायत ॥२५५॥

प्र꣢ । मि꣣त्रा꣡य꣢ । मि꣣ । त्रा꣡य꣢꣯ । प्र । अ꣣र्यम्णे꣢ । स꣣च꣡थ्य꣢म् । ऋ꣣तावसो । ऋत । वसो । व꣣रूथ्ये꣢꣯ । व꣡रु꣢꣯णे । छ꣡न्द्य꣢꣯म् । व꣡चः꣢꣯ । स्तो꣣त्र꣢म् । रा꣡ज꣢꣯सु । गा꣣यत ॥२५५॥

Mantra without Swara
प्र मित्राय प्रार्यम्णे सचथ्यमृतावसो । वरूथ्ये३ वरुणे छन्द्यं वचः स्तोत्रꣳ राजसु गायत ॥

प्र । मित्राय । मि । त्राय । प्र । अर्यम्णे । सचथ्यम् । ऋतावसो । ऋत । वसो । वरूथ्ये । वरुणे । छन्द्यम् । वचः । स्तोत्रम् । राजसु । गायत ॥२५५॥

Samveda - Mantra Number : 255
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु जीव से कहते हैं कि (ऋतावसो) = हे ऋत के धनी! (मित्राय अर्यम्णे) = मित्र और अर्यमा के लिए वरूथ्ये (वरुणे-वरूथ्य) और वरुण के विषय में तथा (राजसु) = राजा के विषय में (सचथ्यम्) = समवेत हो जानेवाले तथा (छन्द्यम्) = प्रबल इच्छा पैदा करनेवाले (वचः) = स्तुतिवचन का (प्रगायत) = खूब गायन करो। ऋत का अर्थ है ठीक। जो ठीक स्थान में व ठीक समय पर हो वह ‘ऋत' है। जो व्यक्ति प्रत्येक क्रिया को ठीक स्थान व ठीक समय पर करने पर बल देता है, वह ऋतावसु - ऋत का धनी है। इसे निम्न पाँच व्यक्तियों को अपने जीवन का आदर्श बनाना चाहिए -

१. (मित्राय) = जो मित्र है - स्नेह करनेवाला है, जो अपने जीवन में किसी के साथ कटु व्यवहार नहीं करता, सबके साथ स्नेहपूर्वक ही चलता है। २. (अर्यम्णे) = 'अर्यमेति तमाहुर्यो ददाति'=जो देनेवाला है, जो दान देता है, सदा पञ्च यज्ञ करके यज्ञशेष ही खाता है। ३. (वरूथ्ये) = जो धन के विषय में उत्तम है। [वरूथ=wealth] - अर्थात् धनी होकर धन का विनियोग सदा उत्तम कर्मों में ही करता है। धन के कारण उसमें शराब, व्यभिचारादि दुर्गुणो का प्रवेश नहीं हो गया। ४. (वरुणे) = जो वरुण है-पाशी है- जो सैकड़ों व्रतों के पाशों में अपने को जकड़े रखता है। ५. जिसकी प्रत्येक क्रिया सूर्य (राजसु) = जिसका जीवन बड़ा नियन्त्रित [well regulated] है। और चन्द्रमा की भाँति नियमित चाल से चलती है। हमारे जीवन के आदर्श उल्लिखित पाँच व्यक्ति हों, हम इनके लिए स्तुतिरूप वचनों को बोलें, परन्तु इनके गुणों का गान केवल शाब्दिक न हो। वे गुण-वचन (सचथ्य) = हों- हममें समवेत होनेवाले हों, अर्थात् वे गुण हमारे जीवन के अङ्ग बन जाएँ।

इस प्रकार जो व्यक्ति उल्लिखित पुरुषों के गुणों को अपने जीवन का अङ्ग बनाता है वह ‘जमदग्नि’ है, उसकी अग्नि पाचनशक्ति से पूर्ण है। उसने सुन-सुनाकर वहीं पल्ला नहीं झाड़ दिया, उसे अपचन नहीं हुई। वह एक के बाद एक गुण को अपने जीवन का अङ्ग बनाता चला है। इस प्रकार अपने जीवन का परिपाक करने से वह भार्गव है। [भ्रस्ज् पाके]
Essence
हम स्नेह, दान, धन का उत्तम विनियोग, व्रतबन्धन व नियमितता इन पाँच गुणों से अपने जीवनों को विभूषित करें।
Subject
पञ्चाङ्गपूर्ण जीवन