Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 251

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिर्मेध्यातिथिर्वा काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣢दु꣣ त्ये꣡ मधु꣢꣯मत्तमा꣣ गि꣢र꣣ स्तो꣢मा꣣स ईरते । स꣣त्राजि꣡तो꣢ धन꣣सा꣡ अक्षि꣢꣯तोतयो वाज꣣य꣢न्तो꣣ र꣡था꣢ इव ॥२५१॥

उ꣢द् । उ꣣ । त्ये꣢ । म꣡धु꣢꣯मत्तमाः । गि꣡रः꣢꣯ । स्तो꣡मा꣢꣯सः । ई꣣रते । सत्राजि꣡तः꣢ । स꣣त्रा । जि꣡तः꣢꣯ । ध꣣नसाः꣢ । ध꣣न । साः꣢ । अ꣡क्षि꣢꣯तोतयः । अ꣡क्षि꣢꣯त । ऊ꣣तयः । वाजय꣡न्तः꣢ । र꣡थाः꣢꣯ । इ꣣व ॥२५१॥

Mantra without Swara
उदु त्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते । सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव ॥

उद् । उ । त्ये । मधुमत्तमाः । गिरः । स्तोमासः । ईरते । सत्राजितः । सत्रा । जितः । धनसाः । धन । साः । अक्षितोतयः । अक्षित । ऊतयः । वाजयन्तः । रथाः । इव ॥२५१॥

Samveda - Mantra Number : 251
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में भक्त के निजी जीवन की तीन विशेषताओं का उल्लेख हुआ था। प्रस्तुत मन्त्र में उसके सामाजिक जीवन का चित्रण करते हैं । १. (त्ये स्तोमासः) = वे स्तुति के पुञ्जरूप भक्तलोग (उ)=निश्चय से (मधुमत्तमाः गिरः) = अत्यन्त मधुरवाणियों का (उदीरते) = उच्चारण करते हैं। इनके मुख से कभी कटु शब्दों का उच्चारण नहीं होता। स्तोम शब्द का अर्थ स्तुति होता है, परन्तु भक्ति-रसायन का सेवन करनेवाला यह व्यक्ति सदा स्तुतिरूप शब्दों का उच्चारण करने से 'स्तुति का पुञ्ज' बन गया है। २. (सत्राजितः) = क्रोध का ये सदा संयम करनेवाले हैं। ये अपने में दूसरों के प्रति क्रोध को उत्पन्न नहीं होने देते। ३. धनसा = [सन्- संविभाग] वे दीन-दु:खियों के लिए धन का संविभाग करनेवाले होते हैं। ४. (अ-क्षित ऊतयः)=इसके यहाँ शरणागत की रक्षा का कभी नाश नहीं होता। ये अपने प्राण देकर भी शरण में आए हुए की रक्षा करते हैं । ५. (वाजयन्तः) = उल्लिखित सब कार्यों को करते हुए ये प्रभु की अर्चना करते हैं, जिससे इन कार्यों का उन्हें गर्व न हो जाए। -

इस प्रकार पवित्र व विनीत जीवन बिताते हुए ये (रथा इव) = रममाणा इव= प्रसन्नता का जीवन बिताते हैं, और रहमाणा:- बड़ी तीव्र गति से अपनी जीवन-यात्रा के पथ पर बढ़ते हैं। ये ही वस्तुतः मेधातिथि व मेध्यातिथि हैं। 
Essence
मैं भी प्रभु का सच्चा भक्त बनूँ, मुझसे माधुर्य का प्रवाह बहे ।
Subject
भक्त का सामाजिक जीवन