Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 250

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिर्मेध्यातिथिर्वा काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा पुरूवसो꣣ गि꣡रो꣢ वर्धन्तु꣣ या꣡ मम꣢꣯ । पा꣣वक꣡व꣢र्णाः꣣ शु꣡च꣢यो विप꣣श्चि꣢तो꣣ऽभि꣡ स्तोमै꣢꣯रनूषत ॥२५०॥

इ꣣माः꣢ । उ꣣ । त्वा । पुरूवसो । पुरु । वसो । गि꣡रः꣢꣯ । व꣣र्धन्तु । याः꣢ । म꣡म꣢꣯ । पा꣣वक꣡व꣢र्णाः । पा꣣वक꣢ । व꣣र्णाः । शु꣡च꣢꣯यः । वि꣣पश्चि꣡तः꣢ । वि꣣पः । चि꣡तः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । स्तो꣡मैः꣢꣯ । अ꣣नूषत ॥२५०॥

Mantra without Swara
इमा उ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम । पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितोऽभि स्तोमैरनूषत ॥

इमाः । उ । त्वा । पुरूवसो । पुरु । वसो । गिरः । वर्धन्तु । याः । मम । पावकवर्णाः । पावक । वर्णाः । शुचयः । विपश्चितः । विपः । चितः । अभि । स्तोमैः । अनूषत ॥२५०॥

Samveda - Mantra Number : 250
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मस्तिष्क, मन, शरीर व संसार [धन] के चारों क्षेत्रों में विजय प्राप्त करनेवाला व्यक्ति
प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे (पुरूवसो) = पालक व पूरक निवास देनेवाले प्रभो! (इमा याः मम गिरः)=ये जो मेरी वाणियाँ हैं, वे (उ)= निश्चय से (त्वा वर्धन्तु) = आपका वर्धन करें। मैं सदा आपके स्तुतिवचनों का उच्चारण करूँ। मेरे मुख से निकलनेवाला प्रत्येक शब्द आपकी महिमा का प्रतिपादक हो। मेरे श्वासोच्छलास के साथ आपका जप चले।

मेरा जीवन आपकी भक्तिरूप रसायन का सेवन करनेवाला हो। जो व्यक्ति इस रसायन का सेवन करता है, उसके जीवन में निम्न परिवर्तन दीखते हैं

१. (पावकवर्णाः) = ये भक्त अग्नि के समान वर्णवाले होते हैं। शरीर का स्वास्थ्य व मन की शान्ति इन्हें अग्नि के समान चमका देती है।

२. (शुचयः) = प्रभु के भक्त धन के प्रति कभी आसक्त नहीं होते और इसी का परिणाम है कि वे धन की दृष्टि से सदा पवित्र होते हैं। वे किसी का ऋण न चुकाएँ इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उनके मन में धन का लोभ नहीं होता, इसी का बहुत कुछ परिणाम है कि वे राग-द्वेष से ऊपर उठे होते हैं।

३. (विपश्चितः) = ये भक्त विशेष सूक्ष्मता से देखते हुए चिन्तनशील होते हैं। जिन व्यक्तियों के जीवन में उल्लिखित परिणाम दीखते हैं, वे ही वस्तुतः (स्तौमैः)=स्तुतियों से (अभि अनूषत)=प्रभु का स्तवन करते हैं। भक्त होगा तो उसका जीवन 'पावकवर्ण, शुचि व विपश्चित्' का जीवन होगा ही।

इसी व्यक्ति के लिए कहा जा सकेगा कि वह मेधातिथि है, समझदारी से चल रहा है और मेध्यातिथि है– प्रभु के मार्ग पर चल रहा है।
Essence
मैं शरीर में पावकवर्ण, मन में शुचि व मस्तिष्क में विपश्चित् बनूँ।
Subject
भक्त की परिभाषा [ Definition ], भक्ति-रसायन का सेवन