Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 248

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡मि꣢न्द्र य꣣शा꣡ अ꣢स्यृजी꣣षी꣡ शव꣢꣯स꣣स्प꣡तिः꣢ । त्वं꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ हꣳस्यप्र꣣ती꣢꣫न्येक꣣ इ꣢त्पु꣣र्व꣡नु꣢त्तश्चर्षणी꣣धृ꣡तिः꣢ ॥२४८॥

त्व꣢म् । इ꣣न्द्र । यशाः꣢ । अ꣣सि । ऋजीषी꣢ । श꣡व꣢꣯सः । प꣡तिः꣢꣯ । त्वम् । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । हँ꣣सि । अप्रती꣡नि꣢ । अ꣣ । प्रती꣡नि꣢ । ए꣡कः꣢꣯ । इत् । पु꣣रु꣢ । अ꣡नु꣢꣯त्तः । अ । नु꣣त्तः । चर्षणीधृ꣡तिः꣢ । च꣣र्षणि । धृ꣡तिः꣢꣯ ॥२४८॥

Mantra without Swara
त्वमिन्द्र यशा अस्यृजीषी शवसस्पतिः । त्वं वृत्राणि हꣳस्यप्रतीन्येक इत्पुर्वनुत्तश्चर्षणीधृतिः ॥

त्वम् । इन्द्र । यशाः । असि । ऋजीषी । शवसः । पतिः । त्वम् । वृत्राणि । हँसि । अप्रतीनि । अ । प्रतीनि । एकः । इत् । पुरु । अनुत्तः । अ । नुत्तः । चर्षणीधृतिः । चर्षणि । धृतिः ॥२४८॥

Samveda - Mantra Number : 248
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जो व्यक्ति अनासक्तभाव से कर्तव्यों को करता हुआ आगे बढ़ता चलेगा, वह अवश्य अपनी यात्रा में सफल होगा। प्रभु कहते हैं कि (इन्द्र) = हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव त्(वम्)=तू (यशा: असि)= यशस्वी है। तू अपनी यात्रा को पूर्ण करके विजय पताका को फहरा पाया है। यात्रा की निर्विघ्न पूर्ति का सर्वप्रथम रहस्य यही है कि १. तू इन्द्र बना है, इन्द्रियों का अधिष्ठाता बना है। इन्द्रियाँ शरीररूप रथ के घोड़े हैं। जो व्यक्ति घोड़ों को काबू कर पाएगा वही उन्हें निर्दिष्ट स्थान की ओर ले जाएगा ।

२. (ऋजीषी)=तू ऋजीषी है। ऋजीषी शब्द के तीन अर्थ हैं- [क] पकड़ना, [ख] परे धकेलना, [ग] आगे बढ़ना । इन्द्र ऋजीषी है। यह यात्रा में बाधक बननेवालों को पकड़ता है, उन्हें परे धकेलता है और आगे बढ़ता है। कोई भी विघ्न इसकी यात्रा को रोक नहीं पाता। 

३. (शवसः पतिः) = यह शक्ति का पति है। शक्तिशाली होने से यह थककर बीच में ही रुक नहीं जाता, ४. (त्वम्)=तू (अप्रतीनि)= अनन्त शक्तिवाले [of matchles strength] (वृत्राणि)=मार्ग रोकनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि को (एक-इत्)=अकेला ही, औरों के भरोसे न बैठकर (हंसि)=नष्ट कर डालता है। ये काम-क्रोध जीव के मार्ग निरोधक शत्रु हैं। जो इन्द्र होता है, वह इन्हें नष्ट कर डालता है।

५. (पुरु अनुत्तः) = इस यात्रा में वह अपने रथ का 'पालन व पूरण' करता है। इस रथ को वह अतिभोजन, अतिजागरण, अतिस्वप्नादि की दलदल में फँसने से बचाता है और स्वयं कभी शत्रुओं से विषय - गर्त में नहीं धकेला जाता।

६. (चर्षणीधृतिः)=इन्द्र इस यात्रा को पूरा कर पाया इसका अन्तिम रहस्य यह है कि यह ‘मनुष्यों का धारण करनेवाला' बना। ('सर्वभूतहिते रतः') = प्रभु का भक्ततम माना जाता है। लोकसेवा की वृत्ति उसे विषय - स्वार्थ में गिरने से बचाती है। 'चर्षणीधृति' का एक और भी अर्थ है। [चर्षणी=कर्षणी] ये कृषि व उत्पादक काम के सिद्धान्त को दृढ़ता से धारण करता है। तथा ‘चर्षणयः द्रष्टारः' यह द्रष्टा बनने का प्रयत्न करता है। खेलनेवाला उतनी अच्छी प्रकार खेल को नहीं देख पाता जितना कि 'खेल का द्रष्टा । द्रष्टा बननेवाला संसार को ठीक रूप में देखता है और ठीक रूप में देखनेवाला फँसता नहीं। इसी का परिणाम होता है कि यात्रा निर्विघ्न पूर्ण हो जाती है।

इस मन्त्र के ऋषि 'नृमेधपुरुमेधौ आङ्गिरसौ ' हैं। इस मन्त्र का ऋषि आङ्गिरस तो है ही-[शवसस्पतिः], नृमेध भी है- मनुष्यों से मेल करनेवाला है [मेधृ सङ्गमे] । बिना इस मेल के उसके लिए अपना भी पालन व पूरण सम्भव न होता, औरों का तो वह करता ही क्या ? अतः यह 'पुरुमेध' है।
Essence
हमें इस जीवन में यह लक्ष्य रखना चाहिए कि विजय पताका फहराते हुए यात्रा को अवश्य पूर्ण करना है।
Subject
विजय पताका फहराते हुए