Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 244

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣢ ऋ꣣ते꣡ चि꣢द꣣भिश्रि꣡षः꣢ पु꣣रा꣢ ज꣣त्रु꣡भ्य꣢ आ꣣तृ꣡दः꣢ । स꣡न्धा꣢ता स꣣न्धिं꣢ म꣣घ꣡वा꣢ पुरू꣣व꣢सु꣣र्नि꣡ष्क꣢र्ता꣣ वि꣡ह्रु꣢तं꣣ पु꣡नः꣢ ॥२४४॥

यः꣢ । ऋ꣣ते꣢ । चि꣣त् । अभिश्रि꣡षः꣢ । अ꣣भि । श्रि꣡षः꣢꣯ । पु꣣रा꣢ । ज꣣त्रु꣡भ्यः꣢ । आ꣣तृ꣡दः꣢ । आ꣣ । तृ꣡दः꣢꣯ । स꣡न्धा꣢꣯ता । स꣣म् । धा꣣ता । सन्धि꣢म् । स꣣म् । धि꣢म् । म꣣घ꣡वा꣢ । पु꣣रूव꣡सुः꣢ । पु꣣रु । व꣡सुः꣢꣯ । नि꣡ष्क꣢꣯र्ता । निः । क꣣र्त्ता । वि꣡ह्रु꣢꣯तम् । वि । ह्रु꣣तम् । पु꣢नरि꣡ति꣢ ॥२४४॥

Mantra without Swara
य ऋते चिदभिश्रिषः पुरा जत्रुभ्य आतृदः । सन्धाता सन्धिं मघवा पुरूवसुर्निष्कर्ता विह्रुतं पुनः ॥

यः । ऋते । चित् । अभिश्रिषः । अभि । श्रिषः । पुरा । जत्रुभ्यः । आतृदः । आ । तृदः । सन्धाता । सम् । धाता । सन्धिम् । सम् । धिम् । मघवा । पुरूवसुः । पुरु । वसुः । निष्कर्ता । निः । कर्त्ता । विह्रुतम् । वि । ह्रुतम् । पुनरिति ॥२४४॥

Samveda - Mantra Number : 244
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
निष्काम कर्मों से हम उस प्रभु को पाते हैं (यः) = जो (अभिश्रिषः ऋते चित्)=सन्धान द्रव्य के बिना ही, (जत्रुभ्यः आतृदः पुरा) = ग्रीवास्थि [Coller bone] पूरा-पूरा कट जाने से पहले, अर्थात् यदि गला ही अलग न हो गया हो तो, (सन्धिं सन्धाता) = जोड़ों को फिर जोड़ देनेवाला है। संसार में इस प्रकार वे व्यक्ति भी जिनको डाक्टर असाध्य रोगी ठहरा देते हैं ठीक होते देखे जाते हैं। ये सब बातें प्रभु की अनिर्वचनीय महिमा को प्रकट करती हैं। आयुर्वेद में अन्तिम औषध ‘भगवन्नाम-स्मरण' है। भगवान् के नाम स्मरण से मनोवृत्ति में अन्तर आकर अन्दर की सोमशक्ति रोगों को दूर कर देती है। बिलकुल लटक गई हदियों के जोड़ भी फिर से जुड़ जाते हैं। वे प्रभु सचमुच (मघवा) = पवित्र ऐश्वर्यवाले हैं (पुरुवसुः) = पालक और पूरक निवास देनेवाले हैं। (विद्रुतम्) = कटे हुए को (पुनः निष्कर्ता) = फिर संस्कृत कर देनेवाले हैं। संसार में होनेवाली ये अखुत घटनाएँ हमें उस प्रभु का स्मरण करातीं हैं। शरीर में सारे-के-सारे सन्धिबन्ध बिना चिपकानेवाले पदार्थों के बँधे हैं। उन बन्धनों को देखकर ही उस अखुत् कृतिवाले प्रभु के प्रति हम नतमस्तक हो जाते हैं।

सचमुच ‘मेधातिथि' = ज्ञान - मार्ग पर निरन्तर चलनेवाला व्यक्ति शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग की रचना में उस मेध्य= पवित्र प्रभु-माहात्म्य को देखता है और उसकी ओर चलनेवाला बनकर ‘मेध्यातिथि' हो जाता है। मेधातिथि से आज वह मेध्यातिथि बना है।
Essence
हम प्रभु की महिमा को समझें और उसके उपासक बनें।
Subject
वह महान् चिकित्सक
Footnote
सूचना-' पुरा जत्रुभ्य आतृद: '='गला ही न कट गया हो' ये शब्द वेद के वास्तविकतावाद [Realism] को कितनी उत्तमता से सूचित कर रहे हैं। कुछ मूल बचा हो तो प्रभुकृपा से रोगी ठीक हो जाता है।