Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 240

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣢꣫ꣳ ह्येहि꣣ चे꣡र꣢वे वि꣣दा꣢꣫ भगं꣣ व꣡सु꣢त्तये । उ꣡द्वा꣢वृषस्व मघव꣣न्ग꣡वि꣢ष्टय꣣ उ꣢दि꣣न्द्रा꣡श्व꣢मिष्टये ॥२४०॥

त्व꣢म् । हि । आ । इ꣣हि । चे꣡र꣢꣯वे । वि꣣दाः꣢ । भ꣡ग꣢꣯म् । व꣡सु꣢꣯त्तये । उत् । वा꣣वृषस्व । मघवन् । ग꣡वि꣢꣯ष्टये । गो । इ꣣ष्टये । उ꣢त् । इ꣣न्द्र । अ꣡श्व꣢꣯मिष्टये । अ꣡श्व꣢꣯म् । इ꣣ष्टये ॥२४०॥

Mantra without Swara
त्वꣳ ह्येहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये । उद्वावृषस्व मघवन्गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये ॥

त्वम् । हि । आ । इहि । चेरवे । विदाः । भगम् । वसुत्तये । उत् । वावृषस्व । मघवन् । गविष्टये । गो । इष्टये । उत् । इन्द्र । अश्वमिष्टये । अश्वम् । इष्टये ॥२४०॥

Samveda - Mantra Number : 240
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र)=परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (त्वम्) = आप (हि) = निश्चय से (चेरवे) = निरन्तर चरणशील-क्रियाशील मेरे लिए (एहि) = आइए । प्रभु उस व्यक्ति को प्राप्त होते हैं जो क्रियाशील है। अकर्मण्य व्यक्ति कभी भी प्रभु का प्रिय नहीं होता। हे प्रभो! मुझ श्रमशील को आप प्राप्त होओ और (भगं विदा:) = ऐश्वर्य प्राप्त कराइए | [विद् provide ] । यह ऐश्वर्य आप मुझे क्यों प्राप्त कराएँ? (वसुत्तये) = धन देने के लिए। [वसु+दा+ति] । धन का सर्वोत्तम विनियोग 'दान' है। मनुष्य दान से अपनी पापवृत्तियों को नष्ट करके अपना परिमार्जन कर लेता है। २. हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशाली प्रभो! आपसे प्राप्त कराया हुआ धन निष्पाप है [मा+अघ]। उस धन को आप (उत् वृषस्व) = मुझपर खूब बरसाइए, जिससे (गविष्टये) = मेरा ज्ञानेन्द्रियों का यज्ञ खूब चले। [गाव: ज्ञानेन्द्रियाणि, इष्टि यज्ञ ] । धन का दूसरा उत्तम विनियोग यही है कि मैं उससे ज्ञान के साधनों को जुटाने में लग जाऊँ । ज्ञानयज्ञ में धन का व्यय सात्त्विक व्यय है। ३. हे (इन्द्र) = [उत् वृषस्व] अवश्य मुझपर बरसिए, जिससे (अश्वम् इष्टये) = मेरा कर्मेंद्रियों का यज्ञ ठीक चले। अश्व - कर्मों में व्याप्त होनेवाली इन्द्रियाँ । ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञानयज्ञ चले, तो कर्मेन्द्रियों से कर्मयज्ञ चलते रहें। ज्ञानयज्ञ के लिए स्वाध्याय के साधनों को जुटाना था, अब कर्मयज्ञ के लिए सामग्री को जुटाना है। धन का इससे सुन्दर विनियोग नहीं है कि १. दान किया जाए, २. उसका ज्ञानयज्ञ में विनियोग किया जाए ३. अग्निहोत्रादि कर्मयज्ञ किये जाएँ। =

धन के इन तीन विनियोगों को करनेवाला व्यक्ति ही 'धन्य' है। वही सुकृति व पुण्यवान् है। जिसने धन का ठीक विनियोग किया वही ‘भर्ग'=ठीक परिपाकवाला, शुद्ध चमकते हुए जीवनवाला बना। धन का दास न बनकर यह प्रभु का सच्चा गायन करनेवाला ‘प्रगाथ' कहलाया है।
Essence
मैं प्रभु-कृपा से धन प्राप्त करूँ और उसे दान, ज्ञानयज्ञ व कर्मयज्ञ में विनियुक्त करूँ।
Subject
धन के तीन विनियोग