Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 235

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ प्र वः꣢꣯ सु꣣रा꣡ध꣢स꣣मि꣡न्द्र꣢मर्च꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ । यो꣡ ज꣢रि꣣तृ꣡भ्यो꣢ म꣣घ꣡वा꣢ पुरू꣣व꣡सुः꣢ स꣣ह꣡स्रे꣢णेव꣣ शि꣡क्ष꣢ति ॥२३५॥

अ꣣भि꣢ । प्र । वः꣣ । सुरा꣡ध꣢सम् । सु꣣ । रा꣡ध꣢꣯सम् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣र्च । य꣡था꣢꣯ । वि꣣दे꣢ । यः । ज꣣रितृ꣡भ्यः꣢ । म꣣घ꣡वा꣢ । पु꣣रूव꣡सुः꣢ । पु꣣रू । व꣡सुः꣢꣯ । स꣣ह꣡स्रे꣢ण । इ꣣व । शि꣡क्ष꣢꣯ति ॥२३५॥

Mantra without Swara
अभि प्र वः सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे । यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्रेणेव शिक्षति ॥

अभि । प्र । वः । सुराधसम् । सु । राधसम् । इन्द्रम् । अर्च । यथा । विदे । यः । जरितृभ्यः । मघवा । पुरूवसुः । पुरू । वसुः । सहस्रेण । इव । शिक्षति ॥२३५॥

Samveda - Mantra Number : 235
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में उपासक 'ज्ञान, शक्ति व त्याग' के लिए तथा वासनाओं पर विजय प्राप्ति के लिए प्रभु को पुकारते हैं। वस्तुतः इस संसार में वह प्रभु ही हमें सिद्धि प्राप्त करानेवाले हैं। इस मन्त्र का ऋषि ‘प्रस्कण्व'=अत्यन्त मेधावी अपने सब साथियों से यह रहस्य की बात कहता है कि (वः)=आप सबके (सुराधसम्) = उत्तम सफलता को प्राप्त करानेवाले (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को (अभि) = जब-जब कार्यों से अवकाश मिले तब अर्थात् चारों ओर से उसी प्रभु की ओर आकर प्(र-अर्च) = खूब अर्चना करो। इस अर्चना से आपको (यथाविदेयथार्थ) = ज्ञान प्राप्त होगा। वस्तुतः ज्ञान का स्त्रोत अन्दर से ही उमड़ता है। बाह्य ज्ञान उस अन्त:स्रोत को क्रियाशील बनाने में सहायक होता है, अतः उस प्रभु की अर्चना हमें यथार्थ ज्ञान प्राप्त कराएगी। (यः) = वे प्रभु (जरितृभ्यः) = स्तोताओं के लिए (मघवा) = [मा- अघ] पापशून्य धनवाले हैं, (पुरुवसुः) = पालन और पूरण के लिए पर्याप्त धन देनेवाले हैं और (सहस्त्रेण इव)=आमोद के साथ सहस् (शिक्षति) = देते हैं। संक्षेप में प्रभु अपने भक्तों को पापशून्य, पालन-पूरण के लिए पर्याप्त, प्रमोदमय धन प्राप्त कराते हैं। प्रभु भक्तों को कभी खाने-पी ने का कष्ट होता हो, ऐसी बात है नहीं।
Essence
प्रभुकृपा से हम अर्चना करनेवाले बनें, जिससे हमारा जीवन सफल, यथार्थज्ञानवाला, पापशून्य तथा पर्याप्त प्रमोदमय सम्पत्ति-सम्पन्न बने।
Subject
पापशून्य, पर्याप्त, प्रमोदमय धन