Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 232

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣣वा꣡ ह्यसि꣢꣯ वीर꣣यु꣢रे꣣वा꣡ शूर꣢꣯ उ꣣त꣢ स्थि꣣रः꣢ । ए꣣वा꣢ ते꣣ रा꣢ध्यं꣣ म꣡नः꣢ ॥२३२॥

ए꣣व꣢ । हि । अ꣡सि꣢꣯ । वी꣣रयुः꣢ । ए꣣व꣢ । शू꣣रः꣢ । उ꣣त꣢ । स्थि꣣रः꣢ । ए꣣व꣢ । ते꣣ । रा꣡ध्य꣢꣯म् । म꣡नः꣢꣯ ॥२३२॥

Mantra without Swara
एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः । एवा ते राध्यं मनः ॥

एव । हि । असि । वीरयुः । एव । शूरः । उत । स्थिरः । एव । ते । राध्यम् । मनः ॥२३२॥

Samveda - Mantra Number : 232
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु जीव से कहते हैं कि यदि तू १. सोमपान करता है, और २. सोमपान करके शक्तिशाली बनता है, मन में सौम्यता को धारण करता है और मस्तिष्क में ज्ञान को भरता है और ३. इस प्रकार वैयक्तिक उन्नति करके लोकसंग्रह के लिए लोगों में उत्साह भरता है तो (एव हि) = निश्चय से तू (वीरयुः असि) = वीरता के साथ मेलवाला है, अर्थात् वीर है (एव शूरः) = इसी प्रकार तू बुराईयों का संहार करनेवाला है, (उत्) = और स्(थिरः) = स्थिर मनोवृत्तिवाला अर्थात् स्थितप्रज्ञ है तथा (एव) = इसी प्रकार (ते) = तेरा (मनः) = मन (राध्यम्) = सदा सिद्ध करने योग्य है। इस प्रकार प्रभु ने 'स्थितप्रज्ञ' का लक्षण दिया है जो स्वयं उन्नत होकर लोकों को उत्साहित करने में लगा रहता है।

यही व्यक्ति ‘श्रुतकक्ष आङ्गिरस' है- ज्ञान की शरण में रहनेवाला, शक्तिशाली।
Essence
हम वीर, शूर, स्थिर व सिद्ध मनवाले बनें। 
Subject
यह तेरी सफलता है [ स्थितप्रज्ञ ]