Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 229

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ब्रा꣡ह्म꣢णादिन्द्र꣣ रा꣡ध꣢सः꣣ पि꣢बा꣣ सो꣡म꣢मृ꣣तू꣡ꣳरनु꣢꣯ । त꣢वे꣣द꣢ꣳ स꣣ख्य꣡मस्तृ꣢꣯तम् ॥२२९॥

ब्रा꣡ह्म꣢꣯णात् । इ꣣न्द्र । रा꣡ध꣢꣯सः । पि꣡ब꣢꣯ । सो꣡म꣢꣯म् । ऋ꣣तू꣢न् । अ꣡नु꣢꣯ । त꣡व꣢꣯ । इ꣣द꣢म् । स꣣ख्य꣢म् । स꣣ । ख्य꣢म् । अ꣡स्तृ꣢꣯तम् । अ । स्तृ꣣तम् ॥२२९॥

Mantra without Swara
ब्राह्मणादिन्द्र राधसः पिबा सोममृतूꣳरनु । तवेदꣳ सख्यमस्तृतम् ॥

ब्राह्मणात् । इन्द्र । राधसः । पिब । सोमम् । ऋतून् । अनु । तव । इदम् । सख्यम् । स । ख्यम् । अस्तृतम् । अ । स्तृतम् ॥२२९॥

Samveda - Mantra Number : 229
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में समाप्ति पर ('दीर्घं सुतम्') = अज्ञानान्धकार के नाशक ज्ञान का उल्लेख हुआ है, ‘यह ज्ञान कैसे प्राप्त होगा' इस बात का उल्लेख प्रस्तुत मन्त्र में है। जीव का ज्ञान नैमित्तिक है। प्रभु का ज्ञान स्वाभाविक है- सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु श्रेष्ठ, निर्दोष हृदयोंवाले 'अग्नि, वायु आदित्य, अङ्गिरा' ऋषियों को वेदज्ञान देते हैं। इस वेदज्ञान को अग्नि आदि से अन्य ऋषि प्राप्त करते हैं - उनसे अगले, और वे अगलों को ज्ञान देते हैं। इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से ज्ञान प्राप्त होता है । १. गुरु कैसे होने चाहिए? २. शिष्य का क्या कर्तव्य है? ३. और ज्ञान प्राप्ति का क्या नियम है? इन विषयों का प्रस्तुत मन्त्र में विचार है।
(गुरु)=गुरु के गुणों का उल्लेख करनेवाले शब्द (ब्राह्मणात्) और (राधसः) हैं। १. (ब्राह्मणात्)=ब्राह्मण से, ब्रह्मवेत्ता से। जिसने अपरा विद्या के अध्ययन के अनन्तर पराविद्या भी पढ़ी हो उस आचार्य से विद्यार्थी को ज्ञान प्राप्त करना है। आचार्य को ज्ञान का समुद्र होना चाहिए। सभी विद्याओं का पारङ्गत आचार्य ही विद्यार्थी की श्रद्धा का आधार हो सकता है। वही स्वयं अग्निरूप होता हुआ विद्यार्थी में ज्ञानाग्नि को समिद्ध कर सकता है। २. (राधसः) = [राध-सिद्धि] सिद्धि को प्राप्त गुरु से । गुरु साधना को बहुत कुछ पूर्ण करके मन को वश में कर चुके हों। तभी वे विद्यार्थियों के आचार का निर्माण कर सकते हैं। एवं, आचार्य का मस्तिष्क ज्ञान से दीप्त हो और मन वशीभूत होने से निर्मल हो।

(शिष्य)-ऐसे आचार्य से हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! तू (सोमं पिब) = ज्ञान का पान कर। १. जो शिष्य इन्द्र= इन्द्रियों का अधिष्ठाता न होगा, वह ज्ञान को ठीक प्रकार से प्राप्त न कर सकेगा। ज्ञान तभी प्राप्त होता है, जब वह केवल विद्या का ही अर्थी हो। २. शिष्य के लिए दूसरा नियम यह है कि वह नियमपूर्वक विद्या का अध्ययन करे । मन्त्र में ‘ब्राह्मणात्' यह पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग इस नियमपूर्वक विद्याग्रहण का संकेत करता है। नियमपूर्वक विद्याग्रहण में ही ‘आख्यातोपयोगे' सूत्र से पञ्चमी विभक्ति आती है। यह भावना स्पष्ट शब्दों में भी (ऋतून् अनु) = शब्दों से व्यक्त हुई है। ऋतुएँ जैसे नियमित गति से आगे और आगे चल रहीं हैं उसी प्रकार विद्यार्थी को नियमित गति से अध्ययन करना चाहिए । 'ऋतु' शब्द नियमित गति का प्रतीक है। नियमित गति के बिना अध्ययन हो ही नहीं पाता।

(अविच्छिन्नता से) – हे शिष्य (तव) = तेरा (इदम्) = यह (सख्यम्) = आचार्य के साथ ज्ञान-प्राप्ति के लिए हुआ-हुआ सम्बन्ध (अस्तृतम्) = अविच्छिन्न हो । तू सदा आचार्य के समीप रहकर अपने ज्ञान को बढ़ानेवाला हो। तू 'अन्तेवासी' बन।
इस प्रकार विद्वान् एवं धार्मिक आचार्य के समीप रहकर नियम से ज्ञान प्राप्त करनेवाला जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी इस मन्त्र का ऋषि 'मेधातिथि'= निरन्तर ज्ञान की ओर चलनेवाला बनता है। कण-कण करके ज्ञान प्राप्तकर यह मेधावी बन जाता है। 
Essence
आचार्य और विद्यार्थी का अविच्छिन्न सम्बन्ध ज्ञान की ज्योति को जगानेवाला हो।
Subject
आचार्य-शिष्य का सम्बन्ध