Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 228

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- दुर्मित्रः कौत्सः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣣दा꣡ व꣢सो स्तो꣣त्रं꣡ हर्य꣢꣯त आ꣡ अव꣢꣯ श्म꣣शा꣡ रु꣢ध꣣द्वाः꣢ । दी꣣र्घ꣢ꣳ सु꣣तं꣢ वा꣣ता꣡प्या꣢य ॥२२८॥

क꣣दा꣢ । व꣣सो । स्तोत्र꣢म् । ह꣡र्य꣢꣯ते । आ । अ꣡व꣢꣯ । श्म꣣शा꣢ । रु꣣धत् । वा꣡रिति꣢दी꣣र्घ꣢म् । सु꣣त꣢म् । वा꣣ता꣡प्या꣢य । वा꣣त । आ꣡प्या꣢꣯य ॥२२८॥

Mantra without Swara
कदा वसो स्तोत्रं हर्यत आ अव श्मशा रुधद्वाः । दीर्घꣳ सुतं वाताप्याय ॥

कदा । वसो । स्तोत्रम् । हर्यते । आ । अव । श्मशा । रुधत् । वारितिदीर्घम् । सुतम् । वाताप्याय । वात । आप्याय ॥२२८॥

Samveda - Mantra Number : 228
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि ‘दुर्मित्रः कौत्सः' है। ‘कुथ हिंसायाम्' धातु से कौत्स शब्द बना है,
यह ‘काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर' इन छह शत्रुओं का संहार करता है, अतः कौत्स है। 'दुर्मित्र' की भावना यही है कि यह पापों व अपमृत्युओं से अपनी रक्षा करता है। काम-क्रोधादि का संहार करके ही तो वह ऐसा कर पाता है। इस दुर्मित्र कौत्स से प्रभु कहते हैं कि -

१. (वसो)= हे उत्तम निवासवाले जीव! तेरे जीवन में (कदा) = कब (स्तोत्रम्) = प्रभु का स्तवन (हर्यते) = तेरी अन्तिम गति व तेरे काम्य प्रभु के लिए होगा, अर्थात् वह दिन कब आएगा जब तू काम-क्रोधादि में न उलझकर, उत्तम जीवनवाला बनकर मेरा स्तवन कर रहा होगा, जो मैं तेरी अन्तिम गति हूँ और तुझसे काम्य हूँ। मुझे प्राप्त कर, तू सभी कुछ प्राप्त कर लेता है। 

२. (कदा)=कब (श्मशा)= शरीर में जाल की तरह बिछी हुई ये नसें (आ) = सर्वथा (वा:)=वीर्यशक्ति को (अवरुधत्)=अपने में रोकेंगी? श्मशा शब्द यास्क ने कुल्या का पर्याय माना है। कुल्या नहर है, नस-नाड़ियाँ भी शरीर की कुल्याएँ हैं। इनके अन्दर बहनेवाले रुधिर में वीर्य उसी प्रकार व्याप्त होता है, जैसे दूध में घृत। मन में जब किसी प्रकार के कुविचारों का मन्थन चलता है तो यह वीर्य रुधिर से उसी प्रकार अलग हो जाता है, जिस प्रकार दूध से घृत [ दही से मक्खन] । इस वीर्य के अलग होने पर रुधिर उतना ही अशक्त हो जाता है, जितना सपरेटा। न तो मनुष्य पूर्णरूपेण स्वस्थ रह पाता है और न ही उसका मस्तिष्क कोई गम्भीर अध्ययन कर पाता है। 

३. अब प्रभु जीव से कहते हैं (दीर्घं सुतम्) = अन्धकार का विदारण करनेवाला [दृ विदारणे] ज्ञान तुझे (कदा) = कब प्राप्त होगा। ज्ञान ही वासनान्धकार को विलीन करनेवाला होता है।

एवं, प्रभु हमसे तीन बातें चाहते हैं १. हमारा झुकाव प्रकृति के भोगों की ओर न हो, हम प्रभु-स्तवन करनेवाले बनें, २. हम वीर्य का संयम करें और ३. हम अपने अन्दर ज्ञान-सूर्य का उदय करें। ये तीनों बातें कैसे होंगी?' इसके लिए मन्त्र के अन्तिम सम्बोधन में संकेत उपलभ्य है। (वाताप्याय) = हे वात को–अपने प्राणों को-आप्यायित-वृद्ध करनेवाले जीव! इस सम्बोधन के द्वारा प्रभु कह रहे हैं कि प्राणों की साधना करो - प्राणायाम करने पर मन्त्रनिर्दिष्ट तीनों ही बातें तुम्हारे जीवन में आ जाएँगी । निरुद्ध वीर्यशक्ति शरीर को नीरोग बनाएँगी, मन को प्रभु-प्रवण और मस्तिष्करूप द्युलोक को ज्ञान - सूर्य से दीप्त।
Essence
हम प्राणायाम द्वारा शरीर को नीरोग, मन को पवित्र व ज्ञान को दीप्त बनाएँ।
Subject
प्राणायाम के तीन लाभ